रविवार, 21 अक्टूबर 2012

बदलते बिहार मे बदलते नितीश


 बदलते बिहार मे बदलते नितीश
 क्या बिहार मे सचमुच विकास  हुआ है ??? क्या बिहार सचमुच विकसित राज्य बनने की और अग्रसर है??? ये ऐसे प्रश्न हैं जो नितीश कुमार के सत्ता मे आने के बाद लगातार बिहार और बिहार से बाहर चर्चा का विषय है 


                                                  
 अभी बिहार मे हो रहे हाल की घटनाओ पर नजर डाले तो ये साफ़ दीखता है की नितीश कुमार की शाख गिरी है. अब ये भी सवाल उठता है की क्या ये विपक्ष की कोई चाल है या सच मे नितीश कुमार अब बिहार मे लोकप्रिय नही रहें . यहाँ ये चर्चा करने की जरूरत है की नितीश कुमार किन हालातो मे पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने , बिहार की जनता लालू और उसके परिवार के सदस्यों की मनमानी से तंग आ गयी थी , चारो तरफ आराजकता का माहौल बन गया था . १५ सालो मे लालू यादव ने बिहार को कोमा की स्थिती ला कर खड़ा कर दिया  .                                                      
                       

यादवो और पिछरी जातियों के लोगो का ये तर्क था की लालू यादव ने हमे बोलने के लिया आवाज दिया है ,हमे ताक़त दी है की हम सवर्णों और ताक़तवर लोगो का विरूद्ध आवाज  उठा सके. परन्तु क्या इसी बिनाह पर कोई १५ साल तक शासन  कर सकता है???  ९० के दशक मे अपहरण एक उद्योग के रूप मे स्थापित हो चूका था और बहुत सारे बाहुबली अपनी मनमानी कर रहे थे ..
                              

ऐसे मे जब नितीश कुमार  एक विकल्प के रूप मे उभरे तो बिहार की जनता ने उन्हें खुल कर वोट दिया . खासकर लालू यादव के मुख्य वोट बैंक  यादव और मुस्लिम ने भी नितीश कुमार को वोट दिया .सत्ता मे आने के बाद नितीश कुमार ने बहुत तेजी से काम भी किया , खासकर उन्होंने बिहार के कानून व्यवस्था को अपने शाषण  के शुरुवाती दिनों मे ही बहुत हद तक सुधार दिया .५ महीने के अन्दर लगभग सभी बाहुबली जेल के अन्दर थे परन्तु मोकामा विधायक अनंत सिंह पर कोई करवाई न होना उनकी सत्यनिष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लगाता है ....
                    

बिहार मे जिस तेजी रोड बनायीं गयी उतनी तेजी से पहले कभी नही बनाई गयी थी ,नितीश कुमार का ये  वादा  की सड़के इस तरह की बनेगी की  चाहे आप बिहार की किसी भी कौने मे हो  पटना ७ घंटे के अन्दर पहुच जायेगे ,७ घंटे के अन्दर तो नही लेकिन सड़के पहले से काफी  अच्छी  हुई हैं,इसमें कोई शक नही है .. साइकिलो से स्कूल जाती लडकियां बिहार की पहचान बन गयी.......
                            

तो ऐसे मे ये प्रश्न  उठना लाज़िमी है की आखिर नितीश कुमार से गलती हुई कहाँ???? क्या उनका मीडिया मैनेजमेंट गलत हो गया या उनकी सोशल इंजीनियरिंग को लकवा मार गया.


                                             कारणों को खोज करने की कोशिश पर पता चलता है की नितीश कुमार ने खुद अपने ही  पैर पर कुल्हारी मारी है .पहले चरण मे ऐसे शिक्षको की नियुक्ति करना जो सिर्फ इंटर पास हैं और जिनके पास कुल प्रतिशत आधिक है ,नितीश कुमार की बहुत बड़ी भूल थी ,  जिस लालू के शाषण की बुराई  करते नितीश कुमार  नही थकते थे  वे ये कैसे भूल गए की उस समय बिहार मे प्रतिशत कैसे लाये जाते थे , अगर उस तरह के शिक्षक बच्चों को पढ़ाएंगे तो शिक्षा का स्तर तो गर्त मे जाएगा ही . हाल के अधिकार यात्रा के दौरान इन्ही शिक्षको ने नितीश कुमार का बिहार के विभिन्न जिलो मे विरोध किया .जिसका पूरा फायदा लालू और रामबिलास पासवान ने उठाया ,ऐसे ही मुद्दों के ताक  मे ये दोनों न जाने कितने दिनों से मुह बाये खड़े थे .              
                             

यहाँ बड़ा सवाल ये है की नियोजित शिक्षक न ही परीक्षा मे बैठना चाहते हैं न ही उनके पास उच्चतर डिग्री है तो वे किस आधार पर स्थायी शिक्षको के जैसी सुविधायो और वेतन की मांग कर रहे हैं ??? इस परिस्थिति मे नितीश कुमार का नियोजित शिक्षको के प्रति कड़ा रुख ने आग मे घी डालने का काम किया है  ...
                          

जिस मिडिया को उन्होंने इतने दिनों तक मैनेज कर के रखा था आज वही मिडिया उनके खिलाफ आग क्यों उगल रहा है ,क्या बिहार मे  मिडिया को सत्ता परिवर्तन होने की बू मिल गयी है या सच मे मिडिया निष्पक्ष होना चाहती है ????
                           

दूसरा कारण वह नरेन्द्र मोदी का गुजरात दंगो को लेकर विरोध करते हैं , लेकिन जब वे रेल मंत्री थे और गुजरात दंगे भड़के थे तो उस समय नेतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा क्यों नही दिया .. और जब वे मुख्यमंत्री बन गए तो सेकुलर होने का ढोंग करने लगे , इस से भाजपा मे भी उनके खिलाफ विरोध के स्वर उभरने लगे हैं .
                        नितीश कुमार चारो तरफ से चाटुकारों से घिर गए हैं ,उन्हें ये पता ही नही चल पाता  की जनता मे उसके खिलाफ कहाँ और क्यों विरोध है ??? दूसरी तरफ विधानसभा मे विपक्ष की न्यूनतम संख्या ने भी नितीश कुमार को आत्मविमुघता  की स्थिती मे ला खड़ा किया है .
                     

ऐसे मे  चारो तरफ समस्याओ से घिरे नितीश कुमार की अब वास्तविक परीक्षा शुरू होती है , लालू यादव के खराब शाषण का सीधा लाभ नितीश कुमार को मिला , बिहार की जनता ने बिजली देखी,अच्छी सड़के देखी ,बेटियाँ घेरो से निकलकर बाहर पड़ने को निकली . नितीश कुमार ने विकास  का पैमाना तय किया ,किन्तु अब नितीश कुमार के सामने लगातार विकास करने की चुनौती है,लोगो की आकांक्षाओं पर खड़े होने की चुनौती  है .  नितीश कुमार को ये हमेशा  याद रखना चाहिए की बिहार की जनता बड़े बड़े सत्ता परिवर्तन करने का आदि रही है ...........                                                                                                                       

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

जलता तिब्बत जलते लोग


नयी दिल्ली , १५ अक्टुबर. जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में १३ अक्टुबर को तिब्बतियों के समर्थन में शांतिपूर्ण  केंडल मार्च निकला गया . इसमें ज्यादातर तिब्बत ,साउथ कोरिया और  नेपाली मूल के लोग शामिल  थे . तिब्बती नागरिक लगातर चाइना के खिलाफ अपने विरोध किसी न किसी रूप में  रहते दर्शाते  हैं . उसी की एक कड़ी जे.न .वि  में देखने को मिली .
                  
                        Description: C:\Users\HCL\Desktop\2012-10-13 19.55.15.jpg
                     “आत्मदाह किये हुए तिब्बती युवको  की तस्वीर”
  एक तिब्बती नागरिक “किनले शेरिंग” ने बातचीत के दौरान   बताया की तिब्बत को आजाद करवाने की कोशिश में बहुत सारे युवाओं ने आत्मदाह किया और लगातार कर रहे हैं . उन्होंने कहा इसके बाद भी चाइना सरकार की  कान में जूं तक नही रेंगा .किनले ने एक पत्र दिखाते हुआ कहा की वे लोग इस पत्र को तिब्बतियों की तरफ से संयुक्त रास्त्र संघ के सचिव ‘बान की मून ’ को भेजने वाले हैं . उन्होंने बताया की इस पत्र के माध्यम से वे लोग बताना दुनिया को बताना चाहते हैं की किस तरह चाइना ने बीते छह दशक  से तिब्बत का हर प्रकार से दोहन किया है .चाइना सरकार ने न सिर्फ तिब्बत के प्राकृतिक संसाधन का दोहन किया है बल्कि वहां के लोगो के साथ काफी अत्याचार किया है.
    पत्र के अनुसार  वर्ष २००८ में चाइना रक्षा बल के जवानों ने तिब्बतियों के साथ काफी सख्ती से करवाई की . शेरिंग बताते हैं उसके बाद से स्थिति लगातार बदतर होती गयी , लोगो ने विरोध स्वरूप आत्मदाह करने का तरीका अपनाया है. इस हिंसात्मक तरीके के बारे में पूछने पर किनले बताते हैं की पूरी दुनिया तक अपनी बात बताने का इस के सिवाय हमारे पास और कोई दूसरा रास्ता नही था .
किनले ने पत्र की ओर इशारा करते हुआ बताया की हम संयुक्त रास्त्र से ये अपील करते हैं की एक निष्पक्ष जाँच एजेंसी को जल्दी तिब्बत भेजा जाये ताकि वहां की सच्चाई पूरी दुनिया के सामने आ सके . किनले ने बताया की हम ‘ फ्लेम ऑफ़ ट्रुथ’  कार्यकर्म चला रहे हैं जिसके अंतर्गत हम दुनिया भर  से हस्ताक्षर  एकत्रित कर रहे हैं और दुनिया भर से अपने लिए समर्थन जूता रहे हैं.
पास में ही एक लड़की बार बार बात करने की कोशीश  कर रही थी , पूछने पर उसने बताया की वह साउथ कोरिया से है और तिब्बतियों का समर्थन कर रही है . हालाँकि वह ठीक से इंग्लिश नही बोल पा  रही थी लेकिन फिर भी  मसले पर चाइना के खिलाफ उसका विरोध स्पष्ट समझ में आ रहा था .
       इधर जे’.नि .वि. में आत्मदाह किये हुआ युवको को शर्धांजलि दी जा रही थी वही दुसरे दिन “‘तेम्द्रिन दोरजी” नामक तिब्बतियों की अधिकार की लडाई लड़ने वाले युवक ने चाइना में ही आत्मदाह कर लिया . हैरानी की बात यह है की इस के बाद भी चाइना सरकार दलाई लामा पे दोष मड़ते जा रही है.


जलता तिब्बत जलते लोग


नयी दिल्ली , १५ अक्टुबर. जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में १३ अक्टुबर को तिब्बतियों के समर्थन में शांतिपूर्ण  केंडल मार्च निकला गया . इसमें ज्यादातर तिब्बत ,साउथ कोरिया और  नेपाली मूल के लोग शामिल  थे . तिब्बती नागरिक लगातर चाइना के खिलाफ अपने विरोध किसी न किसी रूप में  रहते दर्शाते  हैं . उसी की एक कड़ी जे.न .वि  में देखने को मिली .
                  
                        Description: C:\Users\HCL\Desktop\2012-10-13 19.55.15.jpg
                     “आत्मदाह किये हुए तिब्बती युवको  की तस्वीर”
  एक तिब्बती नागरिक “किनले शेरिंग” ने बातचीत के दौरान   बताया की तिब्बत को आजाद करवाने की कोशिश में बहुत सारे युवाओं ने आत्मदाह किया और लगातार कर रहे हैं . उन्होंने कहा इसके बाद भी चाइना सरकार की  कान में जूं तक नही रेंगा .किनले ने एक पत्र दिखाते हुआ कहा की वे लोग इस पत्र को तिब्बतियों की तरफ से संयुक्त रास्त्र संघ के सचिव ‘बान की मून ’ को भेजने वाले हैं . उन्होंने बताया की इस पत्र के माध्यम से वे लोग बताना दुनिया को बताना चाहते हैं की किस तरह चाइना ने बीते छह दशक  से तिब्बत का हर प्रकार से दोहन किया है .चाइना सरकार ने न सिर्फ तिब्बत के प्राकृतिक संसाधन का दोहन किया है बल्कि वहां के लोगो के साथ काफी अत्याचार किया है.
    पत्र के अनुसार  वर्ष २००८ में चाइना रक्षा बल के जवानों ने तिब्बतियों के साथ काफी सख्ती से करवाई की . शेरिंग बताते हैं उसके बाद से स्थिति लगातार बदतर होती गयी , लोगो ने विरोध स्वरूप आत्मदाह करने का तरीका अपनाया है. इस हिंसात्मक तरीके के बारे में पूछने पर किनले बताते हैं की पूरी दुनिया तक अपनी बात बताने का इस के सिवाय हमारे पास और कोई दूसरा रास्ता नही था .
किनले ने पत्र की ओर इशारा करते हुआ बताया की हम संयुक्त रास्त्र से ये अपील करते हैं की एक निष्पक्ष जाँच एजेंसी को जल्दी तिब्बत भेजा जाये ताकि वहां की सच्चाई पूरी दुनिया के सामने आ सके . किनले ने बताया की हम ‘ फ्लेम ऑफ़ ट्रुथ’  कार्यकर्म चला रहे हैं जिसके अंतर्गत हम दुनिया भर  से हस्ताक्षर  एकत्रित कर रहे हैं और दुनिया भर से अपने लिए समर्थन जूता रहे हैं.
पास में ही एक लड़की बार बार बात करने की कोशीश  कर रही थी , पूछने पर उसने बताया की वह साउथ कोरिया से है और तिब्बतियों का समर्थन कर रही है . हालाँकि वह ठीक से इंग्लिश नही बोल पा  रही थी लेकिन फिर भी  मसले पर चाइना के खिलाफ उसका विरोध स्पष्ट समझ में आ रहा था .
       इधर जे’.नि .वि. में आत्मदाह किये हुआ युवको को शर्धांजलि दी जा रही थी वही दुसरे दिन “‘तेम्द्रिन दोरजी” नामक तिब्बतियों की अधिकार की लडाई लड़ने वाले युवक ने चाइना में ही आत्मदाह कर लिया . हैरानी की बात यह है की इस के बाद भी चाइना सरकार दलाई लामा पे दोष मड़ते जा रही है.


सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

A long walk to coffee house

नयी दिल्ली ,८ अक्टूबर ,    ९ प्रधानमंत्री ,२ राष्ट्रपति ,२ उप राष्ट्रपति और ३४ मुख्यमंत्री का गवाह रह चुकी कॉफ़ी हाउस की संस्कृति काफी अनूठी है

                                                           दिल्ली के दिल कनाट प्लेस के मोहन सिंह प्लेस मे अवस्थित कॉफ़ी हाउस २७ अक्टूबर १९५७ से लोगो की चर्चाओ का केंद्र बना हुआ है . यह इंडियन कॉफ़ी वोर्केर्स कॉपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड द्वारा संचालित होता है

                                                            देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ,लालबहादुर शास्त्री ,इन्द्रा गाँधी ,राजीव गाँधी ,आई के गुजराल , वी पी सिंह ,चन्द्र शेखर ,नरसिम्हा राव ,अटल बिहारी वाजपेयी अपने राजनितिक जीवन के शुरुआत से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक यहाँ आते रहे .

                                                                     

                                                       "कॉफ़ी हाउस के मेनेजर श्री  जनक राज "

                                                           
                                                             १९७२ से कॉफ़ी हाउस के मेनेजर जनक राज अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताते है की खालसा कॉलेज की स्थापना पर उन्होंने इंदिरा गाँधी को कॉफ़ी पिलाई थी . जनक राज बताते है की यहाँ समाज का संभ्रांत वर्ग भी आता है तो वही दूसरी ओर मध्यवर्गीय परिवार भी यहाँ आनंद उठाता दिख जाता है , उन्होंने बताया की १९९५ के आस पास वित्तीय संकट के कारण यह बंद होने के कगार पर पहुच गया था परन्तु सामाजिक कार्यकर्ताओ के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पाया. कॉफ़ी हाउस की दयनीय अवस्था के लिए बहुत हद तक सरकार को जिम्मेदार मानते है . वे कॉफ़ी हाउस की लिस्ट की तरफ इशारा करते हुए कहते  है की इतने कम दामों मे इसे चला पाने मे  काफी मुश्किले आती है, जिस कारण यहाँ के २२ कर्मचारी को काफी कम वेतन मिल पता है .


                                                          " कॉफ़ी हाउस की मूल्य सूचिका"
                                                                                                                                                                                 
                                                              १९६८ से लगातार कॉफ़ी हॉउस आ रहे व्यापारी दिनेश कुमार शर्मा बताते हैं की अब कॉफ़ी हॉउस मे सम्मानित व्यक्ति आने से कतराते हैं , क्योंकि यहाँ का स्तर लगातार गिर रहा है . शर्मा जी बताते हैं की यहाँ अब साफ़ सफाई का आभाव है ओर सरकार द्वारा पर्याप्त सुविधाएँ देने के बाद भी ये लोग लगातार मूल्य बढ़ाते जा रहे हैं.

                                                       वही कॉफ़ी हाउस के बहार अपने दोस्तों के साथ बेठे उमेश मेहता ने बताया की वे यहाँ १९७० से आ रहे है .उन्होंने बताया की अब यहाँ राजनीति ओर साहित्य की बाते कम होती है ओर फिल्मो की जयादा होती है. मेहता साहब बताते है की कॉफ़ी हाउस उनकी संस्कृति का हिस्सा हो गया है .

                                                         कॉफ़ी हाउस के बाहर बैठे   कुछ युवा पूछने पे बताते है की वे यहाँ शांति के मकसद से आते है तथा यहाँ  कम दाम मे साउथ इंडियन डिश का लुफ्त उठाते है .

                                                          कॉफ़ी हाउस के इतिहास मे सुनहरा  दिन तब आया जब २००७ मे  टाइम्स  मैगज़ीन ने इसे एशिया की टॉप फ़ूड पॉइंट मै जगह दी . 

सोमवार, 20 अगस्त 2012

रामदेव की राजनीति

      हमारे देश मे सदियों से हर राजाओ के अपने राजनितिक गुरु रहे हैं जो हमेशा उनका मार्गदर्शन करते रहे हैं . वे वनों, कंदराओ मे रहते थे और एकांतवास पसंद करते थे . सबसे बड़ी बात की वे उच्च कोटि के तपस्वी और ज्ञानी होते थे , उनकी दूरदर्शिता से राजा  और प्रजा को बहुत फायदा होता था .
                                                                                   
     दूसरी तरफ हमारे बाबा रामदेव हैं , निःसंदेह उन्होंने योग को भारत के घर-घर तक पंहुचा दिया है ,यह उनकी बहुत बड़ी उपलब्धि है .  योग, व्यायाम हमारे संस्कृति का हिस्सा रहा  है परन्तु जिस स्तर पर योग गुरु ने इसे लोकप्रिय बनाया,यह काबिलेतारीफ है.हालांकि इससे उन्होंने बहुत सरे पैसे भी कमाएं हैं जो उनके भव्य पंडालो की रौनक और  व्यवस्था को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है .    
                  
       यहाँ तक तो ठीक था ,परंतु अब जो बाबा कर रहे हैं वह कहाँ तक तर्कसंगत है ??? बाबा तो सीधे तौर पर  कहते हैं की उनका राजनीति से कुछ लेना देना नही है परन्तु आन्दोलन के दौरान विपक्षी पार्टीयों का उनके मंच पर आना क्या था??? शरद यादव ,नितिन गडकरी का उन्हें हर मोर्चे पर साथ देने का वादा  करना क्या था ??? या तो भाजपा को बाबा की जरुरत है या बाबा को भाजपा की जरुरत है या फिर दोनो  को एक दुसरे की जरूरत है.
   
      बाबा विदेशो से काला धन लाने के मुद्दे पे कितने गंभीर हैं ,इसकी मंशा पर भी सवाल उठते है. पिछली बार उनका एक ही मुद्दा था विदेशो से काला धन वापस लाना  पर जैसे ही टीम अन्ना भंग हुई उन्होंने लोकपाल के  साथ साथ अन्य मुद्दे भी शामिल  कर लिए.  एक राजनीतिक पार्टी की तरह ही उनके आन्दोलन का चरित्र भी बदलता गया .
   
       मुझे ये समझ नहीं आता की चाहे अन्ना हो या रामदेव किसी एक मुद्दे को ले कर गंभीर क्यों नहीं थे हर बार नए नए एजेंडे को जोड़ने से लोगो मे भ्रम की स्थिति पैदा हुई और आन्दोलन बिखर सा गया.

       सबसे बड़ा सवाल यह है की लोकतंत्र मे सबको अपनी बात रखने का और विरोध जताने का अधिकार है, इसके बावजूद हमें अपना विरोध दर्शाने के  लिए रामदेव और अन्ना की जरूरत क्यों पड़ती है???

        या तो हमारे लोकतान्त्रिक प्रक्रिया मे दोष है या तो सरकार अपने दायित्वों को ले कर गंभीर नहीं है.
        
         हालाँकि इस बार अन्ना के  अन्दोलन मे लोग कम आये परन्तु रामदेव के आन्दोलन मे लोग शुरुआत से ही आ रहे थे. बहुत सारे लोग कहते है की वे तो रामदेव के  समर्थक है , पर क्या वे हमारे देश के नागरिक नहीं है ??? इतने बड़े जनमानस का किसी एक आदमी,विचारधारा से जुड़ जाना और विरोध प्रदर्शन करना निश्चय ही सरकार की अक्षमता को दर्शाता है.

          बाबा मे निसंदेह ही भीड़ जुटाने की क्षमता है तो क्या उनको मिल रहा व्यापक समर्थन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बढ़ा रहा है या यह उनका पूर्वनियोजित एजेंडा है ???

          दूसरी ओर रामदेव को समर्थन देने मे भाजपा का अपना राजनीतिक स्वार्थ है . कांग्रेस के बहुत सारे मुद्दे पर कमजोर हो जाने पर भी भाजपा इसका व्यापक फायदा नहीं उठा पाई , जिस कारण भाजपा रामदेव से जुड़ कर अपने वोटरों की संख्या बढ़ाना चाहती है .

           राजनीति करने के लिए तीन चीजो की जरूरत होती है- पैसा ,पॉवर और समर्थन. संयोग से तीनो ही बाबा के पास है . उन्होंने बड़े पैमाने पे काला धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता फैलाई है, परुन्तु क्या इन सब के पीछे भी उनका राजनीतिक स्वार्थ है???

           राजनीति लोकतंत्र की नीव होती है , राजनीति करना गलत नहीं है , परन्तु आंदोलनों और अनशन की आड़ मे राजनीति करना और जनता की भावनाओ से खेलना गलत है .निःसंदेह बाबा रामदेव को अगर राजनीति ही करनी है तो खुल कर सामने आये और पार्टी बना कर चुनाव लड़े.

            नहीं तो कभी न कभी उनका यह दोहरा चरित्र उन्हें ले डूबेगा !!!!