शनिवार, 2 मार्च 2013

कुंभ दर्शन- मेरी आँखों से




दिल्ली स्टेशन
ट्रेन धीरे-धीरे अपने रफ़्तार से चल रही थी . उस दिन काफी घना कोहरा था , मै अपने भांजों के साथ इलाहबाद अपनी दीदी के घर जा रहा था. ट्रेन के ९ घंटे देरी से आने के बावजूद भी मेरा उत्साह कम नही हुआ. मुझे १२ वर्ष बाद हो रहे कुम्भ मेले में इलाहबाद जाना था ,घूमना तो उद्देश्य था ही साथ-साथ मै ये भी  जानना चाहता था की आखिर लोग कुम्भ के मेले में खो क्यों जाते हैं ? बचपन से ही इस चीज़ को फिल्मों में देखते-देखते मन में एक बच्चो जैसी अभिलाषा जाग उठी की आखिर वहां किस तरह की भीड़ होती है की लोग खो जाते हैं?
             एक सात वर्षीय लड़की जो नीली कुर्ती पहनी हुई है, अपना नाम जुली बता रही है ,जो आरा बिहार से है ,माँ का नाम कुंती देवी है , कृप्या इस बच्ची को उसके अभिवावक  जेट ब्रिज के सामने खोया-पाया विभाग से ले जाये।  मेले में घुसते हीं सबसे पहले हमें यही आवाज सुनाई दी . हम सभी एक–दुसरे को देख कर हंसने लगे, कुछ देर बाद मेरे भांजे ने मुझे देखकर हँसते हुए कहा कि कुम्भ के मेले में आज भी  खोने का सिलसिला अनवरत जारी है .सरकार ने कुम्भ मेले जैसे बड़े आयोजन के अनुसार हीं वहां सुरक्षा व्यवस्था का अच्छा इंतजाम कर रखा था .रेलवे स्टेशन के पास से हीं सुरक्षा व्यवस्था के अच्छे इंतजाम थे.मैं इलाहबाद में अपनी दीदी के यहाँ एयरफोर्स कैंप में ठहरा हुआ था ,१३ कि.मी. दूर कुम्भ जाने के लिए सरकार ने वहां से हि व्यवस्था कर रखी थी।
           जाम और सुरक्षा कारणों से बस ने हमे कुम्भ से ४ कि.मी. पहले हीं उतार दिया , मेरे जैसे आरामपसंद आदमी के लिए यह यह कतई अच्छी बात नही थी,पर वहां का माहौल हीं ऐसा था की पता ही नहीं चला कि कैसे ४ कि.मी. निकल गये और हम कुम्भ के मुख्य गेट तक पहुँच गये  ,जैसा की मैंने पहले हीं वर्णन कया है की मेरे पूर्वानुमान के मुताबिक ही वहां पहुँचते हीं मुझे लोगों की खोने की आवाज सुनाई देने लगी , वैसे तो कुम्भ आने के दौरान हीं सरकारी पोस्टर के अलावा विभिन्न आखाडो के बड़े-बड़े  पोस्टर लगे हुए थे ,लेकिन कुम्भ के मुख्य गेट पहुँचते हीं अखाङो,हिन्दू धार्मिक संस्थानों और विभिन्न गुरुओं की विभिन्न जगहों पर पोस्टरों की भरमार लगी हुई थी।
नागा साधु
                   ऐसा लग रहा था कि मैं किसी मेले में नहीं बल्कि धार्मिक आयोजन में पहुँचा हूँ ,मैं जिस दिन कुम्भ पहुँचा था उस दिन दूसरे शाही स्नान का आयोजन था, इसलिए सुबह से हीं काफी भीड़ थी .कुम्भ का मेला इतना बड़ा और भव्य होता है की इसे विभिन्न सेक्टरों में बाँट दिया जाता है ,मुख्य गेट के पास से हीं नागा साधुओं का बहुत बड़ा अखाड़ा था, मैंने पहली बार किसी नागा साधु को देखा था .पूरे शरीर में भस्म लगा के ,अपने हीं दुनिया में मस्त उनलोगों को देखना बड़ा हीं रोचक अनुभव था. मै उस दिन कुम्भ दोपहर में पहुँचा था ,इसलिये  सुबह नागा साधुओं को नहाते हुए जाते नहीं देख सका . कहते हैं जब नागा साधू सामूहिक स्नान करने जाते हैं,तो ढोल बाजे बजाते हुए बड़े हीं उल्लास के साथ जातें हैं ,वह दृश्य काफी विहंगम होता है .
पिपा पुल
                       अधिक भीड़ के कारण नहाने के लिए जाने का रास्ता बदल दिया गया था ,हमे अब घूम कर संगम तक जाना था . यह हमारे लिए काफी अच्छा था क्योंकि इसी बहाने कम से कम ज्यादा मेला  घूम सके , आगे बढ़ते हीं हमे नदी पर बना अस्थायी पीपा पूल मिला ,जिसे पाड कर हमे नदी के उस पार जाना पड़ा ,पीपा पूल से कुम्भ का नजारा और भी बेहतरीन था ,मेरे समानांतर कम से कम १० और पीपा पूल दिखाई दे रहें थे ,जो की कुम्भ की सुन्दरता को बढ़ा रहें थे . पूल पार करते हीं देखा एक लाइन से साधुओं और बाबाओं के बड़े – बड़े पंडाल लगे हुए हैं. किसी में सत्संग चल रहा था तो किसी में उपदेश बांटे जा रहे थे . बाहर खड़े बाबाओं के शिष्य इशारा कर-करके लोगो को बुलाने की कोशिश कर रहें थे . मैंने विशेष तौर पैर देखा की प्रायः वहां जो भी सत्संग कर रहें हैं ,सभी बाबाओं की पंडाल बहुत भव्य थी ,उनके पंडाल के आगे उनकी लक्जरी कार खरी थी तथा उनके होर्डिंग्स पर ईमेल और वेबसाइट के पते लगे हुए थे .यह सब बताता है की कैसे अब बाबा और साधु भी नये ज़माने के साथ हाईटेक होते जा रहें हैं .

संगम में डुबकी
                            आगे बढ़ने पर हमे बहुत सारी गले में पहनने वाली जंतर युक्त मालाओं की दुकान मिली .जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे ,हमारी थकावट बढती जा रही थी , मेले के अंदर आने  के करीब एक घंटे  बाद भी हम नहाने की जगह तक नहीं पहुँच पाए थे। अब मन कर रहा था कि  जल्दी से जल्दी  संगम में डूबकी लगा कर अपनी थकान को मिटाया जाये . चलते-चलते आखिरकार हम संगम किनारे गंग्नम करने पहुँच हीं गये , वहां भी पुलिस की कड़ी व्यवस्था थी, भीड़ होने के कारण लोगों को जल्दी जल्दी नहाने के लिए कहा जा रहा था .जैसे हीं मै अपने भांजे के साथ नहाने उतरा तो पानी उम्मीद के मुताबिक काफी ठंडा था ,दीदी के द्वारा कहा गया की कैसे भी हो पांच डूबकी तो लगाना हीं है ,सो हमने नाक-कान बंद किया और लगा दी डुबकी, हर-हर गंगे बोलकर , पर पानी इतना गन्दा था की लगा की हम शुद्ध हो रहें हैं या अशुद्ध .हालाकि हम जहाँ नहा रहे थे वह वास्तविक संगम(गंगा,यमुना और अदृश्य सरस्वती नदी ) से काफी दूर था ,प्रशासन द्वारा वहां जाने की सख्त मनाही थी , लेकिन यह मनाही अति विशेष लोगों के लिए नहीं थी .प्रशासन का कहना है की उस जगह पानी काफी गहरा है। 
                 खैर जो भी हो, हमसभी ने बारी-बारी से अपने ही तरीके से शाही स्नान किया।नहाते वक़्त मैंने देखा की एक अधेर उमर की महिला भी नहाना चाह रही हैं ,लेकिन पानी को देख कर डर रही थी,वहीँ पास मौजूद उन्होंने अपने बेटे से बार बार अनुरोध किया की उन्हें पकड़ कर नहला दे ,पर उनका बेटा वहां से टस से मस नहीं हुआ .मुझे ये देखकर काफी दुख हुआ की आखिर कोई बेटा अपनी माँ के प्रति इतना असंवेदनशील शील कैसे हो सकता है??? फिर हम लोगों ने नहाने में उनकी मदद की।  नहाने के बाद सच में हमारी थकान जाती रही .                                                                  




गौधूली बेला
                      अब ये तो पता नही की कुम्भ में नहाने के बाद सच में पूण्य  मिलता है या ये सिर्फ हमारे धार्मिक गुरुओं की मन की बातें हैं .पर हम सभी थकान से मुक्त हो गये और मेरी दीदी ने कहा देखा मैंने तुम्हे कहा था न की कुम्भ में नहाने से जरुर फायदा होता है। दीदी ने फिर कहा ,चलो तुम्हारा क्लास छोड़ के दिल्ली से इलाहबाद आना सफल हो गया .दीदी की इस बात पर हम सभी हंस पड़े। नहाने के बाद हम सभी वहीँ रखे हुए सूखे घास के पास बैठ गये ,पर कुछ ही देर में वहां महिला पुलिस आई और हमे वहां से भीड़ बढ़ने का हवाला देकर उठने के लिए कहने लगी। हम वैसे भी अब कुछ देर में जाने वाले थे इसलिए उनसे बिना कोई विरोध जताए ,हम वहां से आगे बढ़ गये।

                         हम वहां से धीरे-धीरे अपने घर की ओर प्रस्थान करने के  लिए आगे बढ़ने लगे ,तभी हमारे जीजाजी ने कहा की अभी तो 4 हि बजा है ,शांम में कुम्भ मेले का दृश्य काफी विहंगम होता है,आप इतनी दूर से आयें हैं तो ये भी देख कर  हीं जाईयेगा। दिन भर मेले में घुमने के बाद अब मुझे घर जाने का मन कर रहा था  -जाजी के आग्रह को मै  टाल न सका। अनिक्षा से ही सही ,अगर मैं वहां नही रुकता तो शायद मेरा "कुम्भ दर्शन" अधूरा रह जाता।हम अब अब जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहें थे ,हमे ढेरों प्रसाद की दूकान मिलती जा रहीं थी।प्रसाद खरीद कर हम जैसे हीं आगे बढ़ें, मुझे सेक्टर 2 में बहुत सारे छोटे-छोटे तम्बू  दिखें , वहां जाकर पूछने पर पता चला की उन तम्बुओं में रात बिताने की व्यवस्था थी। छोटे होटल से लेकर ब्रांड 5 स्टार होटल तक वहां मौजूद थे ,जिसमे दुनिया भर की सुविधाएं मौजूद थीं।मुझे ये जानकर अच्छा लगा की चलों कुम्भ में सब अपने -अपने हिसाब से वहां रात में ठहर सकते हैं , लेकिन ये सोचकर काफी बूरा भी लगा की जब संगम में अमीर गरीब ,हिन्दू -मुस्लिम सभी बिना भेद भाव के डूबकी लगा सकते हैं तो यहाँ बाहर में इतना भेद-भाव क्यों???

कुम्भ में शांम का नजारा

                                   क्योंकि अँधेरा होने में अभी वक़्त था और हमें अब भूख भी लग रही थी ,इसलिए हम खाने वाले पंडाल की तरफ़ बढ़ने लगे . वहां पहुँचा तो पाया की हर मेले की तरह यहाँ भी सभी चीजों के दाम दोगुने और तिगुने बढ़े हुए हैं। फिर भी भूख तो लगी थी और कुछ नया भी टेस्ट करना था।मेरे जीजाजी जो यहाँ पहले भी आ चूके थे,उन्होंने कहा की यहाँ की जलेबी काफी अच्छी होती है।वैसे भी जेलेबी कथित राष्ट्रीय मिठाई के साथ-साथ मेरा फेवरेट मिठाई भी है .इसलिये मैं खुद अपने से जेलेबी लेने गया और हम सभी ने बड़े चाव से इसे खाया .उसके बाद हम सभी ने समौसे वगैरह खाए और तब तक लगभग शांम हो चुकी थी . कुम्भ मेले में सचमुच शांम का नजारा बेहतरीन होता है ,जब हम घर जाने के लिए रोड पर उपर जाने लगे तो वहां से कुम्भ का नजारा सचमुच काफी विहंगम था , चारों और भव्य पंडाल और उसमे बेहतरीन लाईट मेले की शोभा को बढ़ा रही थी।


                                   कुम्भ से लौटकर जब मै घर पहुंचा तो वहां के अनुभवों को समेट कर मैं बहुत खुश था ,परन्तु एक बात जो मेरे मन में बार-बार खटक रही थी . मैं जब कुम्भ में पंडालों के बीच से जा रहा था तो एक पंडाल के पास जहाँ लोग एक बाबा को सुन रहें थे और उनकी दान पेटी में अपनी अपने मन से रूपये-पैसे दे रहें थे वहीँ दूसरी और उनकी हीं पंडाल के बाहर एक कुष्ठ रोग से ग्रसित भिखारी लोगों से भीख मांग रहा था ,लेकिन लोग उसे पैसे देना तो दूर उसकी तरफ देख भी नहीं रहे थे .ये देखकर मुझे काफी दुःख हुआ और मेले में घुमने के दौरान भी ये दृश्य बार-बार मेरे दिमाग में घूमता रहा।कई दिनों तक इस दृश्य के बारें में सोचकर मैं काफी परेशान रहा . अभी हाल में कुम्भ यात्रियों के साथ हुए दुर्घटना ने मुझे और भी सोचने पर मजबूर कर दिया की धर्म,आस्था तो ठीक है ,पर ये कैसी आस्था है जो की लोगों के जान तक ले लेती है ,ये कैसी आस्था है की जो बाबाओं की झोली तो भरना चाहती है मगर कुष्ठ से तड़प रहे भिखारी की नहीं ???


     

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

एकपक्षीय विरोध ....


दिल्ली में चलती बस में लड़की के साथ जिस अमानवीय तरीके से बलात्कार हुआ,उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाये वो कम है .यह सचमुच मानवता को शर्मसार करने वाली घटना है.युवाओं में इसका व्यापक विरोध देखने को मिल रहा है .दिल्ली के युवाओं में इस घटना के प्रति खासा रोष देखा जा सकता है . लोग सडको पर उतर आये हैं और व्यापक विरोध कर रहे हैं .
                          परन्तु यहाँ एक बात गौर करने वाली है की आखिर इस घटना को इतनी तवज्जो क्यों  मिली ?? क्या यह कारण हो सकता है की इस घटना को काफी अमानवीय तरीके से अंजाम दिया गया था इसलिए इसका व्यापक विरोध हो रहा है . अगर गौर करे तो भारत में बलात्कार करके क़त्ल कर देना नई घटना नहीं है .कई बार तो बलात्कार करके काफी बुरी तरीके से लड़कियों को मार डाला जाता है .कई उदाहरण ऐसे हैं जिनका वर्णन भी नही किया जा सकता .
                              दूसरा कारण यह भी हो सकता है की यह घटना दिल्ली की है ,और चूंकि  दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है तो लोग  इस घटना को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं .पर दिल्ली में इस तरह की घटनायें  पहले भी हो चुकी है तो उस समय इन वीभत्स घटनाओं का इतना व्यापक विरोध क्यों नही हुआ ??
                            तीसरा कारण यह भी हो सकता है की मीडिया ने इस घटना को ज्यादा गंभीरता से लिया .या यूँ कहे तो मीडिया ने भी घटना दिल्ली में होने के कारण इसे व्यापक कवरेज दी .घटना के बाद से अगर गौर किया जाये तो भारतीय मीडिया ने इस घटना को लगातार टी.वी. ,अखबारों के माध्यम से हमे अब तक इस घटना से जोड़े रखा है .हमेशा  अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के चक्कर में रहने वाली टी.वी . मीडिया से क्या ये उम्मीद की जा सकती है की वे इस मामले को लेकर सचमुच गंभीर हैं ???
                             दोस्तों हमारे सामने सवाल तो बहुत हैं ,पर उसका हल उतना ही कम है . कारण चाहे जो भी रहा हो ,पर इस विरोध को नकारा नहीं जा सकता है .यह विरोध जायज भी है  और जरूरी भी  है . परन्तु सच में विरोध करने वाले बहुत ही कम लोग हैं ,जिन्हें सच में इस घटना से गहरा आघात पंहुचा है .इंडिया गेट में पहुचने वाले अधिसंख्यक युवा सिर्फ मौज-मस्ती करने के उद्देश्य से वहां एकत्रित हुए हैं या हो रहे हैं. मौज मस्ती के उद्देश्य से ही सही पर यह भीड़ सरकार को बार बार सोचने के लिए जरुर मजबूर कर रही है . इसी बहाने कई पार्टी और संघटन अपनी बैनर चमकाने में लगे हुए हैं,मानो ऐसा लगता है उन्हें इस तरह की घटनाओं का बहुत दिनों से इन्तजार था .
                       पर मेरा दिल जो बार –बार बेचैन हो रहा है ये सोच कर की बलात्कार सम्बन्धी  सभी घटनाओं का इतना व्यापक विरोध क्यों नहीं होता ??? क्यों हम विरोध करने के लिए  बलात्कार की अमानवीयता और जघन्यता का इन्तजार करते है ?? दिल्ली वाली घटना के आस-पास हीं सहरसा (बिहार का एक जिला) में  एक ८ वर्षीय  दलित लड़की की बलात्कार कर हत्या कर दी  गयी .पर इस घटना का व्यापक विरोध क्यों नही हुआ ???आखिर इस घटना पर आंदोलनकारी और मीडिया को क्यों सांप सूंघ गया ??? इस घटना पर कहाँ चली गयी लोगो की संवेदनशीलता ???
                   क्या उस ८ वर्षीय लड़की के साथ हुए घटना का कोई मोल नहीं है ??? साफ़ पता चलता है की मीडिया को इस घटना को उठाने से कोई ख़ास फायदा नही होता,इसलिए उन्होंने इस मामले को नहीं उठाया  ,दूसरी और जनता का हमदर्द बनने का ढोंग करने वाली पार्टियां भी जानती थी की इस घटना को उठाने से उन्हें कोई ख़ास फायदा नहीं होने वाला हैं .इन सब चीजों को देखने और समझने के बाद लगने लगता है की ये प्रदर्शन भी एकपक्षीय है ये प्रदर्शन भी ग्लेमराइज्ड (चका-चौंध) वाला है. वरना भारत जैसे देश जहाँ हर २२ मिनट में एक बलात्कार होता है वहां अगर हर बलात्कार का इतने हीं जोरदार तरीके से विरोध किया जाता तो हो सकता था बहुत सारी लड़कियों की अस्मत न लुटी गयी होती या बहुत सारी लडकियां बेवजह हवस का शिकार होके मार नहीं डाली गयी होती .....  

रविवार, 13 जनवरी 2013

जाति का जहर ......

                     जाति का जहर
हमारा देश विविधताओं एवं विभिन्नताओं से भरा हुआ देश है ,इस बात पर प्रायः हम गौरवान्वित भी होते रहते हैं ,परन्तु कभी-कभी यही विभिन्नता और विविधता हमारे लिये  घातक बन जाती है . भारत ने कई बार क्षेत्रीय , धार्मिक और जातीय आधार पर मुसीबतें झेलीं हैं , जिसके काफी भयानक परिणाम भी भुगतने पड़े हैं .
                                      परन्तु जाति के आधार पर भेद-भाव काफी खतरनाक है ,यह उस  धीमें  जहर की भांति है जो समाज को धीरे-धीरे खोखला कर देती है .सभी धर्मों में, खासकर हिन्दुओं  में जातिगत भेदभाव काफी ज्यादा है .सवाल यह उठता है की क्या आजादी के ६५ सालों के बाद जब भारत ने काफी तरक्की कर ली है (भलें हीं यह तरक्की एकतरफा है) ,तो क्या जाति  सम्बन्धी मुद्दे उठाने चाहिए .मुझे लगता है आज भी ये मुद्दे काफी प्रासंगिक हैं . चाहे हमने कितनी भी तरक्की क्यों न कर लिया हो ,आज भी देश के कई हिस्सों में जातिगत भेदभाव और छुआछूत विद्यमान है .
                              समाज के धनाढ्य वर्ग ,अपने आपको पवित्र और शूरवीर कहने वाले वर्ग ने अपने फायदे के लिए समाजिक व्यवस्था के नाम पर जाति  का स्वरूप गढ़ा था, जो निरंतर जारी है .दलितों में भी दलित महिलाओं की स्तिथी  तो और भी भयानक है , उन्हें न सिर्फ पुरे समाज से उपेक्षा का दंश झेलना पड़ता है जबकि इस पुरुषवादी सत्ता से भी संघर्ष करना पड़ता है . पूरे समाज में किसी ख़ास जाति के प्रभुत्व की राजनीति बहुत पुरानी है . मौजूदा हालात में देखें तो इस सम्बन्ध में काफी जागरूकता आने के बावजूद भी देश में अधिकांश बड़े पदों पर ऊँची जाति  के लोगों का बोलबाला है .मीडिया भी इससे अछुता नहीं है,यहाँ भी प्रायः ऊँची जातियों के लोगो का हीं  बोल-बाला है ,कई बार ख़बरों में भी इसका सीधा असर देखने को मिल जाता है . आजादी के समय से हीं पिछडी जाति के लोगों को आरक्षण की सुविधाएँ दि गयी हैं , फिर भी स्तिथी बहुत ज्यादा नहीं सुधरी है
                                 हजारों वर्षों से उन लोगों के साथ जो अन्याय और भेद-भाव हुआ है ,इनसे उनकी मानसिक दशा बुरी तरह प्रभावित हुई है , जो की कुछेक दशक पूर्व आरक्षण भर दे देने से नहीं मिट सकती है.  राजनीतिक पार्टियों ने इस मुद्दे पर जम कर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकीं हैं . कई राजनीतिक पार्टियां तो सिर्फ जाति के नाम पर चुनाव लडती है और जीतती है ..फिर चाहे तो वह मायावती हो ,मुलायम सिंह हो या लालू यादव हो . सभी ने अपने –अपने मतलब के लिए किसी ख़ास जाति विशेष का भरपूर उपयोग किया है .मायावती को तो ये लगता है की पार्कों में मूर्तियाँ लगा देने भर से वर्षों से चले आ रहें छुआछूत का अंत हो जायेगा.बिहार में  नितीश कुमार ने इस सम्बन्ध में तो और भी बड़ा दांव खेल दिया .उन्होंने दलितों में भी वर्ग विभाजन कर एक को दलित और दूसरे को महादलित घोषित कर दिया .
                                    ऐसा नहीं है की इस दिशा में किसी ने आवाज नही उठायी  है , जातिगत व्यवस्था हमारे समाज में इस तरह रची-बसी हुई है की इसका समूल नाश करना संभव नही है ,फिर भी गांधीजी ने इस दिशा में अच्छी पहल की थी  . उन्होंने दलितों द्वारा किये गए  सभी कार्य को महान बताया और दलितों को हरिजन का नाम देकर कुछ सम्मान दिलाने की कोशिश भी की .जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए उनहोंने कोई विशेष कार्य नही किया . इस दिशा में भीमराव आंबेडकर ने काफ़ी अच्छा काम किया है .उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त छुआछूत की बुरायी की और दलितों के आवाज उठाने के लिए लगातार संघर्ष किया ,वे दलितों को समाज में  सम्मान और सविधान के माध्यम से कुछ अधिकार दिला पाने में तो जरुर  सफल हुए ,लेकिन जाति व्यवस्था को वों भी ख़त्म न कर सकें   .
                                          आज भी बहुत जगहों से ऐसी खबर आ जाती हैं जिसमे दलितों के साथ अन्याय की बात सामने आती हैं . आमिर खान के प्रोग्राम “सत्यमेव जयते” में एक दलित लड़की से आमिर खान ने बात की थी ,जो अभी संस्कृत की अध्यापिका हैं. उन्होंने बताया की जब वह जे.एन.यू . में पढ़ती थीं, तो वहां भी उनके साथ भेद-भाव होता था . जिस बेंच में वो बैठती थी,उस बेंच में कोई नहीं बैठता था .यह बात सचमुच चौकाने वाली है ,क्योंकी जे.एन.यू . जैसे संस्थान जो इन सब समाजिक मुद्दे को लेकर काफी संवेदनशील है वहां पर भी ऐसी घटना घट सकती है तो देश के और हिस्सों में क्या कल्पना की जा सकती है?अभी कुछ दिन पहले केरल में एक ऐसी घटना सामने आयी, जिसमें दलित समाज में हीं एक उच्च दलित जाती के लोगों ने अपने से निम्न दलित जाति के प्रेमी जोड़े को मार डाला .
                                        दलित जाति में भी जो उच्च वर्ग के हैं ,वे अपने से निम्न दलित को निकृष्ट समझते हैं, यह काफी खतरनाक स्तिथी  है . ब्राह्मणवाद का यह स्वरूप जातिगत व्यवस्था का निकृष्ट उदाहरण है .ब्राह्मणवादी व्यवस्था से मेरा तात्पर्य किसी खास स्वर्ण जाति से नहीं है ,ब्राह्मणवादी व्यवस्था वह व्यवस्था है जिसमे कोई भी जाति या खास समूह अपने आप को सबसे अच्छा जाति या वर्ग समझते है . अगर कोई व्यक्ति खुद को भी  व्यक्तिगत तौर पर सर्वश्रेष्ठ समझता है तो भी वह ब्राह्मणवाद है . जरूरत सिर्फ जाति व्यवस्था में सुधार और समानता की नही है जरूरत है ब्राह्मणवादी सोच से भी मुक्ति पाने की  .......
                   दूसरी तरफ दलित और पिछडे वर्ग भी संगठित होकर सवर्णों  के खिलाफ़ खुल कर आवाज उठा रहें हैं . चूँकि स्वर्ण और ऊँची जाति के लोगों ने दलितों का शोषण किया है ,इस आधार पर उनका भी शोषण होना चाहिए ,यह सोच काफी खतरनाक है . आपसी वैमनस्य और प्रतिरोध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है .इससे समाज में अराजकता की स्तिथी पैदा हो सकती है और इससे किसी का भी भला नही होगा . जरूरत है एक बेहतर समाज बनाने की ,जिसमे सभी समान हो ,किसी को भी उपेक्षित और अछूत न समझा जाये. यह असंभव नही है ,यह हो सकता है . आइये प्रयास करें मिलकर हम और आप ..
धन्यवाद
राहुल आनंद        

बुधवार, 28 नवंबर 2012

शैक्षिक स्तर पर बदहाल भारत ........


भारत युवाओं का देश है और आने वाले समय में भारत युवा शक्ति के आधार पर विश्व शक्ति बनने के सपने भी देख रहा है . परन्तु क्या सिर्फ हम युवाओं की श्रमशक्ति के आधार पर ये सपना देख सकते हैं ???द्वितीय विश्व युद्ध में  जिस तरह  अमेरिका ने अपने परमाणु बम का प्रयोग जापान में किया था , उस समय ऐसा लगा था की जापान फिर शायद दुबारा विश्व की बड़ी  सैन्य शक्ति कभी नही बन पायेगा. ये बात सच भी हुई परन्तु जापान ने दूसरे तरीके से विश्व में अपना परचम  फिर से लहराया  .जापान ने अपने युवाओ को जागरूक और शिक्षित किया. पढाई से इतर वैकल्पिक रोजगार की शिक्षा दी और जापान विश्व के शीर्ष आर्थिक रूप से मजबूत देश में शामिल हुआ . भौगोलिक दृष्टि से अगर देखा जाये तो जापान भूकंप प्रभावित बहुत ही छोटा देश है फिर भी वहां के लोग तमाम मुश्किलों के बावजूद युवा शक्ति का सकारात्मक दिशा में उपयोग कर देश को खुशहाली के रस्ते पर ले गये.
                    

                    भारत के सन्दर्भ में देखे तो यहाँ प्रथिमिकी स्तर से ही शिक्षा का बहुत बुरा हाल है(कुछ निजी विद्यालयों को छोङ कर). आजादी के 65 सालो के बाद भी शिक्षा की स्तिथि में कोई ख़ास सुधार नहीं हुआ है. हम लगातार अपने पडोसी मुल्क चीन से इस मामले मे पिछङते चले गये .जहाँ 70 के दशक तक चीन हमसे शिक्षा के लगभग हर विभाग में पिछङा हुआ था ,वहीँ आज स्तिथि ठीक उसके उलट है .खासकर शोध कार्यों में भारत की स्तिथि और भी खराब है .इसी का कारण है की जिनके पास पैसा होता है या जो रिसर्च करना चाहते हैं वे विदेश जाना पसंद करते हैं .अभी हाल के ही दिनों में एक सर्वे में ये पता चला की विश्व के श्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालय में भारत के एक भी विश्वविद्यालय नहीं है .इससे ज्यादा और शर्म की बात और क्या हो सकती  है ??? संयुक्त रास्त्र संघ में हम वीटो का अधिकार प्राप्त कर उन पांच चुनिंदा देशों की जमात में खड़े होने के लिए लालायित हैं ,लेकिन  विश्व शक्ति बनने के लिए जो बुनियादी अनिवार्यता है उनकी तरफ हमारा कोई ध्यान नहीं है
                                      हमारे देश के बड़े बड़े सम्मानित नेता विदेशो में पढ़कर तो अपनी शिक्षा की भूख मिटाने का प्रयास तो करते हैं पर जो सच में मेधावी है और जिन्हें वास्तव  में विश्व स्तरीय शिक्षा की जरूरत है , उनकी और सरकार का कोई ध्यान नही रहता है . उसके बाद सरकार प्रतिभा पलायन की बात भी करती है .ज्यादातर प्रतिभा को तो जन्म लेने से पहले हीं मार डाला जाता है और जो बमुश्किल बच जाता है वो फिर कभी विदेशों से वापस भारत आना नही चाहते हैं  .  नेता आखिर चिंता भी क्यों करे ?? वे तो अपने सगे –सम्बन्धियों को अच्छी शिक्षा दिला देते हैं तो फिर उन्हें देश के अन्य नागरिकों की चिंता करने की क्या जरूरत  है??
                                         
                         शिक्षा में प्रथिमिकी स्तर पर अगर हाल के दिनों में बिहार की बात करे तो पहले की तुलना में स्तिथि में कुछ सुधार जरुर हुआ है ,परन्तु ये नाकाफी है .सरकार वास्तव में शिक्षा की   स्तिथि सुधारने के बजाय अपनी स्तिथि सुधारना चाहती है .महज साईकिल,मिड डे मील और कुछ पोशाकों  का प्रलोभन देकर स्कूलों में भीड़ तो इकट्ठा की जा सकती है और वोट बैंक भी  बढ़ाया जा सकता है परन्तु अगर शिक्षक हीं योग्य न हो तो हम कैसी शिक्षा की कल्पना कर सकते हैं??? नितीश कुमार ने सत्ता में आते हीं अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए जल्दबाजी में सिर्फ प्रतिशत के आधार पर नियोजित शिक्षकों की बहाली  कर दी . जिस लालू यादव की बुराई करते नितीश कुमार नही थकते ,उन्हीं के समय चोरी करके पास किये हुए छात्रों को उन्होंने पढ़ाने का दायित्व सौप दिया और जो सही में योग्य शिक्षक थे वे कम प्रतिशत की वजह से चयनित नही हो सके . ऐसी में अगर प्राथमिक स्तर से शिक्षा की स्तिथि सही नही होगी तो हम उच्चस्तरीय शोध की बात कहाँ से सोच सकते हैं ???    
           प्रभावहीन बुनियादी शिक्षा के कारण हीं देश में पढ़े –लिखे बेरोजगारों की फ़ौज खङी हो रही है . य़ुवाओ को अच्छी शिक्षा नही मिल पाती है  जिस कारण उन्हें अच्छी नौकरी भी  नहीं मिल पाती है  . ऐसी स्तिथि में युवाओं के बिगड़ने के और गलत रास्ते में जाने के पूरे आसार होते हैं. कुछ युवा इसी कारण नशे की गिरफ्त में आते हैं और अपनी जिन्दगी बर्बाद कर लेते हैं.भारत में सबसे बड़ी समस्या ये है की यहाँ की जनसंख्या के हिसाब से अच्छे और विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय की संख्या नगण्य है . अभी हाल में हीं इंडिया टुडे में एक सर्वे में बताया गया था की हर साल जो लाखो  की संख्यां में इंजीनियरिंग पास आउट हो रहे हैं उनमे से 80 प्रतिशत ऐसी बच्चे हैं जो काम करने लायक ही  नहीं हैं .कुछ कॉलेजों की हालत सही है वरना बाकि कॉलेज मोटी फीस वसूल के सिर्फ डिग्री भर देने का काम करते  हैं .
                                                  भारत में अभी जरूरत है ऐसी शिक्षा पद्धति  की जो युवाओ को बचपन से हीं रोजगार की शिक्षा दे और जो रिसर्च करना चाहते हैं उन्हें भरपूर वित्तीय सहायता भी प्रदान करे.  मसलन कोई अगर खेल में जाना चाहता है तो उसे बचपन से हीं खेल की सामग्री उपलब्ध करायी जाये और माता ,पिता शिक्षको द्वारा उचित मार्गदर्शन भी दिया जाये .  अगर सच में भारत को विश्व शक्ति बनाना है तो बुनियादी स्तर से लेकर रिसर्च विभाग तक पुरे सिस्टम को दुरुस्त करना होगा . अगर शिक्षा के स्तर को जल्दी सुधारा न गया तो  विश्व स्तर पर हम  लगातार पिछङते जायेंगे और  पढ़े –लिखे युवाओं की ऐसी फ़ौज तैयार कर लेंगे जिसकी कार्य क्षमता नगण्य होगी..............
   
धन्यवाद
राहुल आनंद                        

रविवार, 25 नवंबर 2012

बोझ .......


बचपन मे जब भी कोई शादी या उत्सव होता तो मुझे ये सोचकर काफी गुस्सा आता था की कोई भी निर्णय मुझसे पछकर क्यों नहीं लिए जा रहे हैं ??? मुझे लगता था की शादी-ब्याह के मौके पर बच्चों को मिठाई का प्रलोभन देकर सिर्फ काम करवाया जाता है और अगर बड़ों को ज्यादा तरस आ गया तो बच्चों को डांस करने का मौका भी मिल जाता था . 10-12 साल की उम्र से हीं इस बात को लेकर मै अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगा था .उपेक्षित होने के बोझ तले मै दबता जा रहा था .मेरी उपेक्षा तब कुंठा बन गयी होती अगर सही समय पर मेरे घर के सबसे बड़े भैया ने इसे ना पहचाना होता .
                      उन्होंने कहा अरे बेवकूफ तू अभी क्यों उदास होता है .अभी तो तेरे सामने पूरी जिन्दगी पड़ी हुई है .खुल के जियो और जिन्दगी के मजे लो . मैंने उन्हें बड़े हीं रोनी सूरत बना के कहा “साला ये भी कोई जीना है ,जहाँ मेरी कोई सुनता हीं नहीं”. मैंने भैया से कहा मुझे भी बड़ा होना है ,मुझे  भी लोगों पर आर्डर पास करना है  .अगर ऐसा कोई उपाय है तो बताओ भैया . ऐसी घुटन भरी जिन्दगी से मुझे मुक्ति दिलाओ  भैया . मेरे भैया ने मुझपे तरस कहा कर  कहा ,”तू घबरा मत बेटा ,अभी तुझे बहुत जल्दी पड़ी है न बड़े होने की . तू भी बड़ा होगा और बोझ तले दब जायेगा .तब मै तेरे से बात करूंगा
                             मुझे तभी समझ नही आया की ये बोझ क्या होता है??? मुझे लगा की शायद मेरे यहाँ जब धान का समय आता है तो खेत में काम करने वाले सर पर धान का बोझा ढो कर लाते थे  , भैया शायद उसी बोझ की बात कर रहे होंगे . पर मुझे क्या पता था की ये बोझ ऐसी चीज है जो उम्र दर उम्र बढती हीं चली जाएगी .इस बोझ का रिश्ता फेविकोल के जोड़ से भी ज्यादा मजबूत हो जायेगा. अब तो बोझ के साथ जीने की आदत सी हो गयी है .बड़े होने का सारा शौक धुँआ –धुँआ हो गया . बचपन की जितनी भी हेकरी थी सब रफ्फुचक्कर हो गयी.
               हम युवी बड़ें हीं कल्पनाशील होते हैं ,कल्पनाओं की दुनिया में हम अक्सर खो जाते है; बड़े बड़े सपने देखने लगते हैं और लोगों को दिखाते भी हैं , यहीं से शुरुवात होती है बोझ की  . ये बोझ किसी भी प्रकार के हो सकते हैं .पर जो शुरुवाती बोझ  होते  है वो हमारे घर से हीं शुरू होते  है .माँ-बाप हमे पढ़ाते हैं ,हमारे साथ ढेर सारी उम्मीदे जोड़ लेते हैं . बस हमारा बोझ तले दबना यहीं से शुरू हो जाता है और हम फिर कभी  इस बोझ से बाहर नहीं निकल पातें . जब कभी छोटे बच्चो के स्कुल बेग के बोझ  को कम करने के लिए आवाज उठती है तो ,मुझे बहुत हसीं आती है की लोग इस बोझ को तो देख कर तो बच्चो पर तरस खा रहे हैं ,पर जो भयानक अदृश्य बोझ के तले हम दबे हैं उसका क्या???
                                   घर से जब भी एटीएम में पैसे आते हैं यह बोझ काफी शर्मिंदगी के साथ और भी बढ़ जाता है . जब कभी माँ हमारे पड़ोसी के किसी बच्चे के इंजिनियर या डॉक्टर बन जाने पर हमारी तुलनात्मक अध्ययन शुरू करती है तो यह बोझ हमे और भी मुहं फाड़कर चिढाती  है .आजकल एक नया बोझ मार्केट में आया है .अगर आपके किसी परिचित या दोस्त के पास कोई गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड है और  आप अगर इस कमी से जूझ रहे हैं तो ये बोझ तो दुगुना बढ़  जाता है .युवाओ के लिए इससे बड़ा बोझ और क्या हो सकता है ??
                              आजकल हमारे हिंदी पत्रकारिता के छात्र बोझ तले कितने दबे हैं ये तो हमे पता नही ,पर भैया हम तो बहुते बोझ तले दबे हैं .हमारे ऊपर बोझ है एसाइनमेंट बनाने का , हमारे ऊपर बोझ है हमारे गाँव के पड़ोसी का,हमारे ऊपर बोझ है परीक्षा में अच्छा नम्बर लाने का ,हमारे ऊपर बोझ है इंग्लिश जर्नलिज्म और आर.टी.वी . के बच्चो जितना फर्राटेदार इंग्लिश बोलने का ,हमारे ऊपर बोझ है क्लास में ज्यादा बोल पाने का (उ क्या है न भैया हमको कोई कहे हैं की आप खाली  ब्लोगे में बोलते हैं,क्लास में नही ), और सबसे बड़ी बात हमारे ऊपर बोझ है प्लेसमेंट पाने का .
                              तो देखा दोस्तों एक युवा बोझ तले कितना दबा हुआ होता है ,पर फिर भी युवा हीं इस बोझ की गठरी को उतार के फेक भी देता है और खुश रहता है  . हम में बहुत उर्जा है बस जरूरत है उस बोझ को प्रेरणा बना कर जीवन में आगे बढ़ने की . जितने भी लोगों ने कुछ अलग और अच्छा कर दिखाया हैं उन सभी के जिन्दगी में उतने हीं ज्यादा बोझ थे . दुनिया उसी को याद करती है जो बोझ को बोझ नहीं मानते ...
धन्यवाद
राहुल आनंद


शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

एक अधूरी प्रेम कहानी .............


          
 हेलो  ,मै विपिन बोल रहा हूँ..  25 अगस्त की रात ग्यारह बजे मेरे दोस्त का फ़ोन आया जो काफी परेशान लग रहा था . उसने बताया की वह कॉलेज के काम से मधेपुरा(बिहार का एक जिला) गया हुआ था ,पर उसका काम नहीं हो पाया ,जिस वजह से उसे कटिहार स्टेशन पर रात गुजारनी पड़ेगी . मैंने उसे पास के किसी परिचित के पास जाने की सलाह दी  , पर उसने साफ़ मना कर दिया .विपिन ने कहा उसे कल सुबह जल्दी ट्रेन पकड़कर घर जाना है और उसने फ़ोन रख दिया . उस समय मुझे ये नही पता था की यह विपिन से मेरी आखिरी बातचीत थी .अगली सुबह 8:30 बजे गाँव के ही एक दोस्त ने फ़ोन कर के  बताया की घर आने के दौरान टेम्पू पलटने से  विपिन की दुर्घटना हो गयी है .उस समय भी मै चाहता तो विपिन से बात कर सकता था ,लेकिन मैंने सोचा उसे आराम करने दिया जाये और मैंने विपिन से बात नही की . 11:30 बजे फिर से फ़ोन आया की मेरा सबसे अच्छा दोस्त अब इस दुनिया में नही रहा .
                                    उस समय मेरे आई .आई .एम .सी. में आये हुआ करीब एक महीने हीं हुए थे .मै पूरी तरह टूट चूका था .मेरा एक बार मन किया की मै  सबकुछ छोड़ के दिल्ली से  घर चला जाऊं पर उसी की कही बातों को याद करके मै यहाँ रुक गया और अपनी पढाई जारी रखी. विपिन सामान्य कद-काठी का बेहद हीं अनुशासित लड़का था . वह बहुत ही साफ़ दिल का लड़का था .मुझे यहाँ बार –बार “था” लिखने में काफी बुरा लग रहा है , क्योंकि ये विश्वास करना अभी भी मुश्किल है की विपिन अब इस दुनिया में नही है .
                              विपिन की जिंदगी में दो व्यक्ति काफी महत्वपूर्ण थे .एक खुद मै और दूसरा उसकी प्रेमिका संगीता(बदला हुआ नाम). संगीता मेरे छोटे भाई के दोस्त पंकज की बहन थी. हालांकि पंकज भी मेरा अच्छा दोस्त था . पंकज और विपिन दोनों पटना में रहते थे और एक ही गाँव के होने के कारण दोनों में अच्छी  जान –पहचान भी थी. अक्सर विपिन जब भी घर जाता तो पंकज उसे घर से कुछ लेना को कह देता था. इसी क्रम में विपिन और संगीता दोनों पास आ गये और दोनों में प्यार हो गया . परन्तु इस प्यार का सबसे बुरा असर मुझपे पड़ा . विपिन और पंकज दोनों अब एक दूसरे के दुश्मन बन गये . जब भी मै दोनों में से किसी एक के पास जाता तो कोई एक नाराज हो जाता .मुझे काफी दुविधा का सामना करना पड़ता था ,परन्तु विपिन मेरे दिल के काफी करीब था और मै उसी के पास ज्यादा समय बिताता था.
                           एक दिन मै विपिन के पास गया , उसने मुझे बताया की उसे संगीता से प्यार हो गया है और वह उसके बिना नहीं जी सकता है .मुझे बहुत आश्चर्य हुआ  की ये सब इतनी जल्दी कैसे हो गया?? पर जब मैंने विपिन के साथ काफी वक़्त बिताया तो मुझे अहसास हो गया की ये दोनों सच में एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हैं . वो दोनों फ़ोन पर  घंटो बात करते थे ,हालांकि जब मै विपिन के पास होता  था तो वो संगीता से बात करने से बचता था.  मै जब भी उनदोनो को बात करते हुए देखता था तो मुझे बहुत खुशी मिलती थी, वो ऐसी खुशी थी जिसे  शायद शब्दों में बयाँ कर पाना काफी मुश्किल है . दिन बीतते गए और उनदोनो में प्यार काफी गहराता गया . धीरे –धीरे ये बात हमारे गाँव में फैलती चली गयी .आगे वही हुआ जो अमूमन हमारे  सभ्य समाज में होता है . दोनों तरफों से एक दूसरे पर छींटा-कसीं  का खेल शुरू हो गया . फिर उनदोनो ने गाँव में मिलना जुलना साफ़ बंद कर दिया, अब सिर्फ उनदोनो में फ़ोन पर बातें होती थी .
                                         कुछ दिन पहले जब छुट्टियों में मै विपिन के पास गया तो देखा विपिन अब काफी बदल गया है ,वह अब सरकारी नौकरी पाने के लिए जी-तोड़  परिश्रम कर रहा है .मैंने जब विपिन से इसके बारे में पूछा तो उसने बताया की संगीता के घर वाले संगीता पर शादी का दबाव बढ़ा रहे हैं ,इसलिए वह चाहता है की जल्दी से सरकारी नौकरी करके संगीता से शादी कर ले .विपिन ने बताया की अब मै संगीता से बहुत कम बात करता हूँ ताकि अपना पूरा ध्यान पढाई मे लगा सकूं . मैंने सच में नोटिस किया की अब संगीता भी काफी कम बात करती थी .  उनलोगों ने बकायदा अपनी बातचीत का समय निश्चित कर रखा था .मैंने पाया की संगीता  तय किये गये समय में ही विपिन को फ़ोन करती थी .न एक मिनट आगे न एक मिनट पीछे . 
                                      मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा  था क्या सचमुच प्यार ऐसा हो सकता है की एक आदमी की पूरी जिन्दगी हीं बदल के रख दे??? क्या सचमुच प्यार हमारे लिए  प्रेरणास्रोत का काम कर सकता है ??? कल तक जो लड़का पढाई से कोसों दूर भागता था आज वो इतनी पढाई कर  रहा है की उसके हॉस्टल में रहने वाले हर लड़का चकित हैं .कल तक जो लड़का ठीक से इंग्लिश अखबार नही  पढ़ पाता था , आज वो मुझसे धरल्ले से इंग्लिश में बात कर रहा था .मैंने प्यार में लड़के –लड़कियों को बिगड़ते हुआ देखा था . पढाई –पैसा सबकुछ बर्बाद करते देखा था .खुद मेरा अनुभव इस मामले में हमेशा  खराब रहा था. परन्तु मैंने ऐसा प्यार पहली बार देखा था जो सचमुच जीवन में आगे बढ़ने ,कुछ करने की प्रेरणा देती हो .

                                   आई.आई.एम.सी. में आने के बाद विपिन से मेरी बातचीत कम ही हो पाती थी ,पर जब भी बात होती थी तो मै उससे संगीता के बारे में पूछता था. एक दिन विपिन ने मुझसे कहा की वह मेरे पास कुछ दिन के लिए आना चाहता है और इस बात के ठीक १० दिन बाद विपिन चल बसा .जैसे हीं मेरे दोस्त ने विपिन की मौत की खबर मुझे दी थी ,मेरे मन में सबसे पहले यही ख्याल आया की अब संगीता का क्या होगा ??? जिस लड़की ने विपिन को अपना सबकुछ मान लिया था ,वह अब उसके बिना कैसे रहेगी ??मेरे  भाई ने मुझे फ़ोन कर के बताया था की संगीता के घर के पास से बहुत जोर से रोने और चिल्लाने की आवाज आ रही थी ,बाद में पता चला की वह आवाज संगीता की थी .मैंने तुरंत हीं पंकज को फ़ोन किया और कहा  की जो भी गिले-शिकवे तुम्हे विपिन को लेकर थे उसे भुलाओ,और अपनी बहन को संभालो . अन्यथा वो कुछ भी अनुचित कदम उठा सकती है .उसने मुझे आश्वासन भी दिया और उचित कदम उठाने की बात कही . कुछ दिन बाद पता चला की संगीता के मम्मी-पापा संगीता को उसके नानी घर ले गये हैं और उसके बाद संगीता का कुछ पता नही चल पाया है . पंकज से पूछने पर वह मुझे इतना ही बताता है की उसकी बहन जहाँ भी है अच्छी है .पर ये मै अच्छी तरह  समझ सकता हूँ कि संगिता विपिन के बिना कैसे  जी रही होगी.
                                      मैंने एक बार विपिन से पूछा था की तुम्हारा नाम तो विपिन कुमार है ,फिर भी तुम हमेशा हर जगह “विपिन आनंद” क्यों लिखते हो ??? उसने कहा क्युंकी तुम्हारा नाम राहुल आनंद है इसलिए मै अपने नाम के अंत मे आनंद लगाना पसंद करता हूँ .जब भी  मुझे ये बात याद आती है मेरे आसूं नही रुक पाते .मै बहुत रोता हूँ ,रो तो मै आज भी रहा हूँ ,पर इस बात पर नही की मैंने अपना सबसे अच्छा दोस्त खो दिया जबकि इस बात पर  की मेरे दोस्त का प्यार अधुरा रह गया . मुझे आज अगर किसी की चिंता है तो उसकी माँ  की जिन्होंने अपना जवान बेटा  खो दिया ,मुझे आज अगर चिंता है तो संगीता की जिसके सामने पूरी जिन्दगी पड़ी हुई है ……..

रविवार, 18 नवंबर 2012

                           ये कैसी असमानता ???
“आजादी के 65 सालो में हमने तेजी से तरक्की तो की लेकिन उतनी ही तेजी से देश की एक बड़ी आबादी दूर छूटती चली गयी .चमकते भारत की सच्चाई ये है की देश के 25 प्रतिशत आमदनी पर बस कुछ 100 परिवारों का कब्ज़ा है , जबकि हमारी 75 प्रतिशत आबादी रोजाना 20 रूपये से भी कम पर गुजर – बसर करने को मजबूर है , इस अंतर से जन्मा अविश्वास और आक्रोश बढता जा रहा है और शायद  वक़्त हमारे हाथ से फिसलता जा रहा है” – चक्रव्यूह फिल्म के अंत में ये वाइस ओवर मुझे इस फिल्म की सबसे अच्छी बात लगी .
                               ये कैसी असमानता है जो ख़त्म होने का नाम ही नही ले रही है .आखिर ये दिनों दिन बढती क्यों जा रही है ???गरीबो और अमीरों के बीच बढती खाई का ऐसा उदाहरण  विरले हीं किसी और देश में देखने को मिलता है .आखिर ये कैसा विकास है जो कुछ चुनिंदा लोगो और वर्गों तक ही सिमित  है .
                 उदारीकरण आने के बाद भले हीं देश की सरकारी खज़ाने की खस्ताहाल हालत में सुधार आयी हो ,परन्तु इससे गरीबो को कोई खास फायदा नही हुआ . उस समय से हीं सरकारी खज़ाने में गिद्ध जैसी नजरे टिकाये लोगो ने जम कर लुट मचायी .लूट आज भी मच रही है ,जम कर मच रही है . बस हर  बार  लूट का  नाम अलग –अलग  होता है .कभी बोफोर्स के नाम पर,कभी कॉमनवेल्थ गेम के नाम पर, कभी २ जी स्पेक्ट्रम के नाम पर ,कभी कोयला घोटाले  के नाम पर और ना जाने लूट के कितने प्रकार  हैं . ये तो ऐसी लूट है जो देश की जनता के सामने है, पर जो छुपा के लूट का खेल चल रहा है वो तो किसी को भी मालूम नही चल पाता है.
                  ऐसी में  देश का एक बड़ा वर्ग जिनकी सत्ता तक  पहुँच नही थी,वह आर्थिक रूप से पीछे होते चली गयी और आज तक गरीबी और उपेक्षा का दंश झेल रही है .खुद राजीव गाँधी ने कहा था की   “भारत में भ्रष्टाचार की जड़े इतनी गहरी है की विकास के लिए अगर १ रुपया भेजा जाता है तो जरूरतमंद के पास मुश्किल से १० पैसा पहुँच पाता है”. जो लोग सीधे सरकारी खजाने की लूट में शामिल नही हो सके उन्होंने अपने स्तर पर  लूट मचायी .
                             भारत में ऐसे बहुत ही कम कार्यालय हैं जहाँ बिना घूस के ही काम हो जाते हैं , ये एक ऐसी गलत पद्धति विकसित हुई है जो हमेशा गरीबो को मुँह चिढ़ाती है . जिनके पास पैसा होता है वह आराम से अपना काम करवा के निकल जाते हैं और जो गरीब हैं वो कई दिनों तक अपनी एड़ियां घिसने के बाद भी अपना काम नही करवा पाते हैं ..
                               बहुत सारे सज्जन कहते  हैं अब पहले से स्तिथि काफी सुधरी हैं . हाँ ,ये सच है स्तिथि पहले से सुधरी है ,पर किसके लिए, जो पहले से अमीर थे वे और भी अमीर होते चले गये और जो गरीब थे वे और भी गरीब होते चले गए . अगर ऐसा नही होता तो नक्सलवादी हमारे देश में अपनी जड़े गहरी नहीं कर पाते . आज नक्सलवाद सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई है .उन इलाको में सरकार के प्रति काफी गुस्सा है . आखिर गुस्सा हो भी क्यों न ??? इन इलाको में सरकार लोगो को मुलभूत आवश्यकता पहुँचाने में तो नाकाम रही हीं है , और जब जब उनकी जमीन छीन कर कोई फैक्ट्री खोलना की बरी आती है तो सरकार उद्योगपतियों  के पक्ष में खरी दिखती है.
                                              बचपन मे मैंने अपने शिक्षक से स्वाभाविक सवाल पूछा की सर कोई गरीब और कोई अमीर क्यों होता है ??? क्यों हमारे यहाँ काम करने वाला अमलवा मेरे साथ मेरे बिछावन पर साथ बैठकर टी. वी. नहीं देख सकता ??? सर ने बोला ये जो पैसे वाले लोग होते है न ये गरीबों का खून चूस कर ही अमीर बनते हैं . जितने भी बड़े –बड़े मकान होते हैं न उसके आस पास गरीबो की झोपडिया  होतीं है .ये लोग इन्ही को बेवकूफ बना कर अमीर बनते हैं .बेशक उनकी बातें पूर्वाग्रह से ग्रसित थी  ,पर अब जब कभी मै वसंत कुञ्ज या साकेत के डी.ल .एफ  माँल जाता  हूँ और उसके सामने की  झोपड़ियाँ देखता हूँ तो सर की कही बात सच लगने लगती है .
                                 आर्थिक विकास का ये कैसा मॉडल है जो देश में चका-चक सड़के ,बड़े-बड़े मॉलो का निर्माण तो करवा रही है  लेकिन वहीँ देश में ऐसी बहुत सारे लोग ऐसें  है जो रात में भूखे पेट और बिना छत के सोने को मजबूर हैं .आर्थिक विकास का ये कैसा मॉडल है जो सिर्फ बड़े –बड़े शहरो तक ही सारा विकास पहुंचा रही  है और देश में ऐसी बहुत सारे गाँव हैं जहाँ ना सड़के हैं ,न ही  बिजली है .
                हमारे देश के ऊपर 345.8 अरब डॉलर का कुल विदेशी ऋण है जो की जी.डी.पी.का २० प्रतिशत है . इसके बावजूद हाल के दिनों में यु .पी.ए . सरकार में लगातार हो रहे घोटाले ने देश की सरकारी खजाने पर जबरदस्त असर डाला है .यह देश की समेकित विकास के लिए बहुत बड़ा खतरा है .नरेगा जैसी योजनाओ ने कुछ उम्मीद की किरण जरुर जगायी थी ,परन्तु यह योजना भी भ्रष्टाचार की भेट चढ़ गयी .
                    देश के सामने चुनौती है भारत को वैश्विक परिदृश्य में स्थापित करने की और साथ में देश के सभी नागरिको के बीच आर्थिक समानता स्थापित करने की . यह असंभव नहीं है, परन्तु सरकार को देश के अंतिम हिस्से तक ,जहाँ के लोग अभी तक उपेक्षित हैं वहां शिक्षा,रोड और काम पहुँचाने का जोरदार काम करना होगा , नही तो देश में गृहयुद्ध जैसी स्तिथि पैदा हो सकती है और भारत की धरती को अपने ही संतानों के खून से लाल होना पर सकता है ,जो भारत जैसे लोकतंत्र देश के लिए कतई अच्छी बात नही होगी  ......
धन्यवाद
राहुल आनंद