शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

             जे .न .यु. का छोरा ,जिसने दिल सबका तोड़ा   
एक शाम जब मै जे.न.यु. के साबरमती ढाबे की ओर से गुजर रहा था तो मेरे कानो में कुछ आवाज पहुँच रही थी -  “लाले लाले ,लाल सलाम ,जे.न. यु. की लाल मिट्टी को लाल सलाम” – एक लड़की मर्दाने आवाज में उदघोष  कर रही थी और उसके आस पास खड़े लोग लाल सलाम ,लाल सलाम बोल कर उनका उत्साहवर्धन कर रहे थे .
                         पास जाने पर पता चला की वहां कुछ वामपंथी विचारधारा से प्रेरित छात्र­-छात्रा हरियाणा में हो रहे बलात्कार की बढ़ रही घटनाओ का विरोध कर रहे हैं.मुझे बहुत अच्छा लगा की जे.न.यु. में पढ़ने वाले छात्र ना सिर्फ राजनितिक बल्कि समाजिक रूप से भी बहुत जागरूक होते हैं .ना सिर्फ आस पास बल्कि पुरे दुनिया में हो रही गलत घटनाओ का यहाँ विरोध भी होता है.
                                             यह सब सोचते हुए मुझे एक भैया(मेरे दोस्त का भाई) की याद आने लगी जो की शायद 1998 या 1999 में जे.न.यु. स्नातक करने आये थे . उस समय मै बहुत छोटा था .पर इतना जरुर याद है की उनके पापा बहुत खुश थे .वे बहुत ही गर्व से कहते थे की उनका बेटा कटिहार (बिहार का एक जिला ) में पहला लड़का है जिसका चयन जे.न.यु. में चीनी भाषा सिखने के लिए हुआ है.उनका नाम सुमित(बदला हुआ नाम) है  और वो काफी प्रतिभाशाली हैं.
                                      उनके घर की आर्थिक स्तिथि उस समय से ही काफी खराब थी और आज भी कमोबेश ऐसी ही स्तिथि बनी हुई है. उनके पापा ये सोच कर काफी खुश थे की चलो बेटा का जे.न.यु. में चयन हो गया है तो घर की माली हालत सुधरेगी . उनके पापा किसी तरह उन्हें पैसा भेजते रहें ,हालांकि जे.न.यु. में फीस वेगैरह तो काफी कम है परन्तु इनके आलावा भी जो खर्च बाहर में रहने में होता है ,सुमित भैया के पापा वो भी काफी मुश्किल से भेज पाते थे.
                                          समय बीतता गया और मै भी बड़ा होता गया .अब मै चीजों को अच्छे  तरीके से समझने लगा था. 10 वी पास करने के बाद मै +२ करने की चाहत से दिल्ली गया .हालाँकि मैंने दिल्ली में एडमिशन नही लिया पर मुझे सुमित भैया के पास रहने और ज.न.यु. को जानने का मौका मिला,मैंने यहाँ अनुभव किया की सुमित भैया अब काफी बड़ी बड़ी बाते करते हैं ,बहुत सारी बाते तो मेरी समझ में नही आ रही थी . पर ये याद है की वो बार बार समाज को बदलने की बात कर रहे थे
                   ये सब देखकर मेरा भी मन जे.न.यु. में पढने को करने लगा .खासकर ज.न.यु. का खाना खा कर तो मै बहुत खुश था .क्युंकी इस से पहले मै  किशनगंज के हॉस्टल में रहता था  तो वहां का खाना इतना अच्छा नही था. मैंने सुमित भैया से जब जे.न,यु में पढने की बात कही तो वहां मौजूद उनके दोस्तों में से एक ने बोला - जे.न.यु. में पढना है तो जवानी की क़ुरबानी देनी पड़ेगी और घर को भूलना पड़ेगा .नही भी भूलना चाहोगे तो भी खुद बा खुद भूल जाओगे – उन्होंने बड़े ही रहस्यमयी मुस्कान के साथ हँसते हुआ कहा .
                                उसके बाद मै बोकारो चला गया और छुट्टियों में घर गया तो मेरे दोस्त ने बताया की सुमित भैया ने  नौकरी( दरअसल स्नातक करने के बाद सुमित भैया को अच्छी-  खासी नौकरी मिल गयी थी ) छोर दी  है और उन्होंने एम.ए समाजशास्त्र से करने का फैसला किया है .अब सुमित भैया सिविल सेवक बनना चाहते थे . उधर मेरे दोस्त की घर की स्तिथि दिनों दिन बिगडती जा रही थी . उनलोगों को पैसे की सख्त जरूरत थी. सुमित भैया के पिताजी ने सोचा देर से ही सही अगर "आइ. ए. एस" बन गया तो घर की स्तिथि जरुर सुधर जाएगी .
                                             समय बीतता गया और सुमित भैया के माता –पिता दोनों का स्वास्थ्य  खराब होने लगा  ,सुमित भैया की माँ गठिया और पिताजी मधुमेह और ब्लड प्रेशर से ग्रसित हो गये . इन सब चीजों को देखकर मेरा दोस्त घबरा गया और उसने शादी करने की फैसला किया  ताकि माँ के ऊपर से काम का बोझ कुछ कम हो सके . शादी  की तारिक निश्चित हो गयी और जब  सुमित भैया को फ़ोन किया गया तो, उन्होंने कहा मै घर नही आ पाउँगा ,एक महीने बाद मेरी  आई.ए .एस की परीक्षा है. मेरा दोस्त मुझे पकड़कर फूट फूट रोने लगा .वहीँ पास बैठी उसकी माँ भी जोर जोर से रोने लगी .उनकी माँ ने कहा सुमित के लिए हमने क्या –क्या नही किया ,पर न तो वो अब घर आता है और न ही हमारी बात मानता है . मुझे भी सुमित भैया पर बहुत  गुस्सा आया की आखिर वो किस समाज को बदलने की बात करते हैं जब उनके घर के लोग ही उनसे खुश नही हैं.
                                           जब मै बनारस में स्नातक द्वितीय वर्ष का छात्र था तो मै किसी काम से दिल्ली गया और सुमित भैया के पास जे.न .यु. में ठहरा .उस समय सुमित भैया की तबियत खराब चल रही थी .डॉक्टर के पास ले जाने पर पता चला उन्हें बहुत ज्यादा शराब पीने से टी.वी. हो गया है .मुझे बहुत आश्चर्य हुआ की क्या ये सचमुच वही सुमित भैया हैं .उस साल उनका सिविल सेवा में अंतिम अवसर  था और सुमित भैया ने अपनी पी.एच .डी. को रोक कर सिविल सेवा की  तैयारी  करनी शुरू कर दी  .
                                   वहीं दूसरी तरफ उनके पापा एक दिन खेतो में काम कर रहे थे और अचानक चल बसे .किसी तरह सुमित भैया घर आये और अपने पिता को मुखाग्नि दी .सुमित भैया इस बार पुरे तीन साल बाद घर आये थे .उनकी माँ ने कहा तू अब कहीं नही जायेगा ,यही कोई अच्छी सी लड़की देखकर तेरी शादी करा देंगे . कम से कम मरते वक़्त तेरा मुंह तो देख कर मरूंगी . तुम क्या समझोगी?? आज तक कुछ समझी हो जो अब समझोगी –सुमित भैया ने अपनी माँ को झिरकते हुआ कहा और दिल्ली का टिकट बनाने निकल पड़े
                         कुछ दिन बाद सिविल सेवा का रिजल्ट आ गया और सुमित भैया का चयन नही हो पाया .लगभग २ महीने तक  उनका फ़ोन बंद रहा .इधर इनकी माँ का रो रो कर बुरा हाल हो गया था की कही सुमित ने कुछ अनहोनी तो नही कर ली .इसलिए मेरा दोस्त जे.न.यु. गया,उसने मुझसे उनका रूम न. और हॉस्टल  पुछ लिया  था . जैसे ही वह अपने भाई के रूम  पंहुचा तो उसने देखा एक लड़की उनके बेड पर बैठी हैं. कुछ देर बाद वो चली गयी तो मेरे दोस्त ने पूछा की वो कौन थी .सुमित भैया ने झिरकते हुआ जवाब दिया की तुम्हे इससे क्या मतलब ? तुम जाओ अपने बीवी के पल्लू में छुपे रहो .तुम्हे शर्म नही आती की तुमने मेरे से पहले कैसे शादी कर ली ??? इस पर जब मेरे दोस्त ने कहा इसमें तम्हारी भी सहमती थी और शर्म तो तुम्हे आनी चाहिए की वहां घर में माँ तम्हारा राह देख रही है और यहाँ तुम मस्ती कर रहे हो.इस बात पे सुमित भैया ने उसे थप्पर मार दिया .
                                     मेरा दोस्त बमुश्किल से वहां एक दिन और रह पाया और घर चला गया .मेरा चयन संयोग से आई.आई.एम .सी. में दो-दो साक्षात्कारों के लिया हो गया और मै सुमित भैया के पास साक्षात्कार से पांच दिन पहले  ज.न.यु. आ गया . सोचा कुछ मार्गदर्शन भी मिल जायेगा .बात होने के दौरान उन्होंने बताया की वो पी .एच.डी  पूरी करके सक्रिय राजनीति मे  भाग लेंगे .मैंने कहा भैया मेरा मन भी  आई .ए एस .बनने  को करता है . इस पर उन्होंने कहा की आई .ए .एस कभी नही बनना.ये लोग सिर्फ नेताओ का तलवा चाटते हैं,मेरे लगभग सभी आइ.ए एस  दोस्त यही कर रहे है. इसपर मैंने मन ही मन में सोचा जब आपको इतना पता ही था तो इसकी तैयारी हीं क्यों कर रहे थे? क्यों इतने पैसे बर्बाद किये ?आपके पिताजी तो यही राह देखते देखते स्वर्ग सिधार गये की मेरा बेटा आई.ए.एस बनेगा .पर मै कुछ नही बोल पाया .
                      आइ आइ एम सी में पहले साक्षात्कार के ठीक एक दिन पहले मेरी उनसे कुछ बातो पर बहस हो गयी.बात ये थी की वो कैसी राजनीति करेंगे ये बता रहे थे ,उनकी बातो से मुझे घोर आपत्ति थी .वे कह रहे थे की कटिहार की जनता बहुत भोली है वहां जाऊंगा और निर्दलिये  से चुनाव लडूंगा. चुनाव से ठीक पहले लोगो के बीच जाऊंगा और ढेर सारे पैसे ,दारु बाटूंगा ,और चुनाव जीत जाऊंगा .मेरे पास डिग्री ही इतनी है की लोग मुझे तुरंत वोट दे देंगे . इसपर मैंने कहा आप अपनी सारी  डिग्री जला दीजिये ,ये किसी काम का नही है. उन्होंने मुझे कहा तुम अभी भी बेवकूफ हो और दुनियादारी नही समझते हो . तो फिर मैंने इतराते हुआ कहा अगर मै  बेवकूफ होता  तो मेरा आई.आई.एम.सी में कभी चयन नहीं होता और मै अगले दिन आई आई एम सी साक्षात्कार देने पहुंचा और दुबारा फिर कभी सुमित भैया के पास नही गया  .........
              तो दोस्तों कैसी लगी ये कहानी ???? कई बार हमारे जीवन में ऐसे आदमी मिलते हैं जो बाते तो काफी बड़ी बड़ी करते हैं मगर वो अन्दर से खोखले होते हैं .जब आप उनकी जिंदगी को करीब से देखेंगे तो सच्चाई मालूम पड़ती है .अक्सर समाजवाद, वामपंथ. हिन्दूरास्त्र  की बड़ी बड़ी बाते करने वाले लोग बड़े बड़े मॉलो और पबो में तथा विदेशी समान खरीदते आपको दिख जायेंगे.
                                मेरी इस कहानी में भले ही मुख्य किरदार सुमित भैया थे परन्तु मुख्य हीरो मेरा दोस्त ही था जो भले ज्यादा पढ़ा  लिखा नही था परन्तु अच्छे और बुरे की समझ  उसे उसके भाई से ज्यादा थी.  समाज के लिए कम पढ़ा लिखा या निरक्षर आदमी से ज्यादा खतरनाक है  "पढ़ा लिखा मूर्ख" . मेरे ख्याल से सुमित भैया ना ही अपने परिवार के हो सके और ना ही समाज के .इधर सुना है की सुमित भैया प्रोफेसर बन गए हैं बहुत सारी  शुभकामनाये हैं उनको .. परन्तु अब देखना ये है की वह अपने विद्यार्थी को समाज बदलने की कैसी शिक्षा देते हैं. 
    धन्यवाद .................
    राहुल आनंद

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

                      जुली..एक दर्द भरी दास्तां    

“भैया, मै आपके साईकिल को ठेलूं ” – एक पतली सी लड़की ने मुझसे बड़ी हीं  उम्मीदों के साथ पूछा . मैंने उसे अपने सिर को हिला कर सहमती प्रदान की .उसके बाद वह मेरे साईकिल  को करीब आधे घंटे तक लगातार ठेलती रही . मैं साईकिल पर बैठकर भी उतना खुश नही था जितना वो मेरे साईकिल  को ठेल कर खुश थी . यह बात उस समय की जब मै 11 साल का था और उस लड़की की उम्र करीब करीब मेरे से 2 -3 साल छोटी तो जरुर  रही  होगी .उसका नाम जुली था और वो मेरे घर घरेलू काम करने वाली की बेटी थी .
                                        कुछ दिनों बाद मुझे किशनगंज (बिहार का एक जिला) पढाई करने के लिए भेज दिया गया क्योंकि मेरे गाँव में बेहतर शिक्षा का आभाव था . जिस वजह से मै अब सिर्फ छुट्टीयों में ही घर  आ पाता  था . जुली अब भी मेरे घर  आती थी और वो अब भी पहले की तरह ही पतली और कुपोषित थी .उसके पास सिर्फ वही कपडे होते थे जो मेरे घर से त्योहारों या किसी घरेलु उत्सव में दिए जाते थे .
                            मै जब दसवी पास कर घर आया तो पता चला जुली की माँ अब इस दुनिया में नहीं रही .ये किसी ने पता करने की कोशिश तक नही कि की आखिर जुली की माँ को हुआ क्या था?? चार बहनों में जुली सबसे बड़ी थी .अब तो जुली के घर  मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा क्योंकि उसके पिताजी  हमेशा शराब के नशे में धुत रहते थे  .पैसे कमाने की सारी जिम्मेदारी उस लड़की के कंधे पर आ गयी .उस समय उसकी उम्र करीब 13 साल रही होगी .अब जुली हमारे घर में अपनी माँ की जगह काम करने आने लगी .
              दसवी के बाद मैं  +२ करने के लिए बोकारो स्टील सिटी चला गया . करीब छह महीने बाद घर आया तो पता चला की उसके पिता उसकी शादी करवा रहे हैं. मुझे बहुत बुरा लगा की इतने कम उम्र में उसकी शादी कैसे हो सकती है ??बाद में पता चला की उसके पिता उसकी शादी नही उसका सौदा कर रहे थे .जुली के पिता ने एक अधेड़ के हाथो जुली को बेच दिया था और उसके पिता ने जुली की कीमत सिर्फ छह हजार रूपये लगायी थी.  मैंने अपने पिताजी से जब इस बात की चर्चा की तो उन्होंने ने कहा मै बिशना (जुली के पिता) को समझा-समझा के थक चूका हूँ , पर वो मेरी बात नही मान रहा है .उधर मेरी छुट्टी भी  ख़त्म हो गयी और मै बोकारो चला गया  .
                                    कुछ दिन बोकारो में रहने के बाद  मेरे ग्यारहवी  की परीक्षा समाप्त हो चुकी थी और मै १ महीने के लिये घर आ गया था . मैंने घर में देखा की जूली अब मेरे घर काम करने नही आती है .माँ से पूछने पर पता चला की वह अपने ससुराल में है और वह बीच में एक बार घर भी आई थी . मुझे ये जान के अच्छा  लगा की चलो जुली को कम से कम उसके पति ने कहीं और बेचा तो नहीं . हमारे गाँव में ऐसा पहले भी  हो चूका है की लोग गरीबी से तंग आकर अपनी बेटी को शादी के नाम पर बेच देते हैं . उनमे से कई तो फिर दुबारा कभी वापस नही आ पाती हैं  . इसलिए इस हिसाब से तो जुली काफी भाग्यशाली थी की वह वापस अपने गावं आ पायी .
                                             कुछ दिनों बाद मेरा चयन बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हो गया और मै बनारस चला गया,मै लगभग जुली को भूल गया था पर जब कभी उसकी याद आती थी तो बस वह मुझे मेरी साईकिल ठेलती हुई याद आती थी .स्नातक प्रथम वर्ष की परीक्षा के बाद जब मै अपने गावं आया तो जुली गावं आई हुई थी और उसके गोद में एक पेट निकला हुआ और बड़ी आँख वाला बच्चा था .साफ़ तौर पर पता चल रहा था की माँ और बच्चे दोनों कुपोषण के शिकार थे .उस समय भी जुली पेट से थी , यानि 16वा साल आते  आते जुली एक बच्चे की माँ बन चुकी थी और दुसरे  बच्चे की माँ बनने वाली  थी .
                                           मेरी  छुट्टी ख़त्म हो गयी थी और  मै फिर बनारस चला गया था . कुछ दिनों बाद मेरी  माँ का फ़ोन आया की जुली अब इस दुनिया में नही रही.यह सुनते हीं मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और मेरी आँखों से आंसू छलक आये  .माँ से पूछने  पर  पता चला की दूसरा बच्चा होने के दौरान जुली की मौत हो गयी .बचपन में जुली के साथ बिताये पल याद आने लगे .मुझे उसके पिता पर बहुत गुस्सा आया. .
                                      अगर देखा जाये तो जुली की यह मौत स्वाभाविक थी क्योंकि एक तो जुली कुपोषित थी दूसरी उसकी कम उम्र में शादी और बच्चे ने उसके शरीर को जर्जर बना दिया था जिस कारण वह दुसरे बच्चे का बोझ नही सह सकी  और इस दुनिया से चल बसीं . यह कहानी सिर्फ जुली की नही है ,आज भी हमारे देश में ऐसी कई जुलियाँ है जो इसी तरह असमय मौत का शिकार होती है . यह साफ़ तौर पर  हमारी शाइनिंग इंडिया की पोल खोलती है.  पता नही चल पाता की सरकार किस विकास का दावा करती है ,जबकि आज भी हमारे देश में मातृ मिर्त्यु दर सर्वाधिक बनी हुई है.  
     अब हमारे यहाँ जुली की दूसरी बहन टूली काम करती है पर खुशी  की बात  ये है की टूली स्कूल भी जाती है और वह कुपोषित भी नही दिखती है .मैंने भी प्रण लिया है की अब जबकि मै आई.आई .एम .सी. में हूँ तो  जो जुली के साथ जो  हुआ वो मै टूली के साथ कतई नही होने दूंगा. ...........................

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

नक्सलवाद- समस्या या समाधान

                                              नक्सलवाद -समस्या या समाधान


नक्सलवाद भारत में एक ऐसी  समस्या के रूप में  उभर  रहा है जिसका अगर तुरंत समाधान नही किया गया तो यह पुरे देश को दीमक  की तरह खा जायेगा  .पिछले कुछ वर्षों में नक्सलवाद  का तेजी से विकास हुआ है , जो भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिये  बहुत बड़ा खतरा है .
                                                                        
                                                               यहाँ ये प्रश्न उठना लाजिमी है की आखिर इसकी उत्पत्ति क्यों और किस उद्देश्य के लिये  हुई ????? आखिर हमारे ही  देश के नागरिक में इतनी असंतुष्टि की भावना क्यों हो गयी की   वे शस्त्र  उठाने के लिये  मजबूर हो गए..... 





नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आन्दोलन का अनौपचारिक नाम है  जो भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ  है . नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबारी से हुई है जहाँ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजुमदार और कानू  सान्याल ने सत्ता के खिलाफ एक सशस्त्र आन्दोलन की शरुआत की .मजुमदार चीन के कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसको में से एक थे. उनका मानना था की भारतीय मजदूरो और किसानो की दुर्दशा के लिये  सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन  तंत्र और कृषि तंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है उनका मानना था की  इस वर्चस्व को सिर्फ सशस्त्र  क्रांति द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है . 
                                                     
                                                  मजुमदार की मौत   के बाद यह आन्दोलन एक से अधिक शाखाओ में विभक्त हो अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया .आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनितिक पार्टी बन गए हैं और संसदीय चुनाव में भाग लेते हैं . लेकिन बहुत सारे सगठन आज भी छद्म लड़ाई में लगे हैं . नक्सलवाद की सबसे ज्यादा मार आंध्राप्रदेश ,छतीसगढ़ ,ओडिशा ,झारखण्ड,और बिहार में झेलनी पड़  रही है 

                              नक्सलवाद की   उत्पत्ति का सबसे बड़ा कारण सरकार की गलत नीतियां हैं , आजादी के ६ दशक बीत जाने के बाद भी देश में ऐसे बहुत सारे हिस्से हैं जहाँ विकास तो दूर लोगो की मुलभुत आवश्यकता  भी पूरी नही हो पाई है .ये लोग वर्षो से शोषित और उपेक्षित हैं .देश में उदारीकरण के बाद अमीरों और गरीबो के बीच की खाई और बढती चली गई .जो  आमिर थे वे और भी आमिर हो गए वहीँ दूसरी और जो गरीब,आदिवासी और उपेक्षित लोग थे वे और भी गरीब होते चले गए . ऐसे में नक्सली इसे अपने लिये  समाधान के रूप में देख रहे हैं वहीँ ये सरकार के लिया निःसंदेह समस्या है 
                          
                                                                                      सरकार विकास के नाम पर आदिवासियों की जमीन    लगातार हड़प रही है ,जिस कारण आदिवासियों में सरकार के खिलाफ व्यापक रोष है, इसी रोष का कारण है की  नक्सली सस्त्र उठाने को मजबुर  हुए हैं परन्तु क्या हिंसा किसी समस्या का समाधान है , क्या नक्सलियों के शस्त्र उठाने से इस समस्या का समाधान हो जायेगा ??? 

                                                                             ये कभी संभव नही  है की भारत जैसी लोकतांत्रिक देश में कोई भी संघठन या समूह हथियारों के बल पर पुरे व्यवस्था को बदल दे .  ये भले हो सकता है की देश में कुछ देर के लिये  अराजकता का माहौल पैदा हो जाये , परन्तु हथियार कभी भी किसी भी समस्या का समाधान नही हो सकती .     
             देश की सुदूर इलाको में सरकार के खिलाफ इस तरह का अविश्वास पैदा हो गया है की नक्सल ग्रसित इलाको में लोग कोई भी विवाद से  निपटने के लिये  वहां के नक्सल नेता की मदद लेते हैं बजाय  देश की न्यायपालिका के .   यह सरकार की सामूहिक  विफलता है की देश में एफ .डी.आई .लाने  को तो ये लोग बैचैन हैं लेकिन नक्सल ग्रसित इलाको का विकास कैसे हो, वहां बिजली, सड़क ,और बाकि मुलभुत चीज़े कैसे पहुचे इनसे उन्हें कोई मतलब नही है .
                                         मुझे ये बात समझ नहीं आती की जो नेता ५ सालो तक इन इलाको में जाने से घबराते हैं वे चुनावो के वक़्त वहां कैसे पहुँच जाते हैं??? वही दूसरी ओर सरकार अगर विकास करने की कोसिस भी कर रही है तो नक्सली नेता स्कुलो ,सरकारी संस्थानों को  बम धमाको से उड़ा देते हैं ,पिछले साल नक्सलियों ने घेर कर ७३ जवानो को मार दिया ये घटना काफी दिल दहला देने वाली थी ओर उसके बाद सरकार ने भी ग्रीन हंट के नाम पे न जाने कितने आदिवासियों की जान ली .

                                                    उन्हें ये समझ में क्यों नही आता की ये सब करने से वे ओर भी पीछे हो जायेंगे ,इतिहास गवाह है की बन्दुक के बल पे जहाँ भी सत्ता स्थापित की गयी है वहां हमेशा अराजकता की स्थिति पैदा हो जाती  है ,भारत जैसे देश जो लोकतंत्र की प्रयोगशाला है वहां के लिये तो ये  ओर भी असहजता वाली स्तिथि होगी .      
                          पहले तो आदिवासी सरकार द्वारा उपेक्षित हुए ,उनकी जमीने छीन ली गयी ,प्रयाप्त सुविधाओ से उन्हें वंचित रखा गया ओर अब कुछ नक्सली नेता इन गरीबो के कंधो पर दो नाली रखकर गोली चलाते हैं .हर जगह अगर कोई बलि का बकरा बनता है तो वो है गरीब, उपेक्षित ओर कमजोर .  
                                                                
 जैसे जैसे नक्सलियों की ताक़त बढती गयी उनमे भी विलासी जीवन की कामना बढती गयी ओर वहां भी प्रयाप्त भ्रस्टाचार बढता जा रहा है .गरीब ये नही समझ पा  रहे है की नक्सली भी उनका अपने फायदे के लिये  उपयोग कर रहे हैं 

                        ऐसे समय में जहाँ देश के सामने बहुत सारी समस्याएं हैं वही नक्सलियों की समस्या सरकार के लिये  बड़ी समस्या बन कर उभरी है,    अब सरकार के  सामने ये चुनौती है की कैसे इस समस्याओ का  समाधान निकाला जाये , ये तो सत्य है की आदिवासियों और नक्सलग्रसित  इलाको में देश की व्यवस्था के खिलाफ काफी गुस्सा है .इस गुस्से को समाज के असमाजिक तत्व और भी बढ़ावा दे रहे हैं  वही दूसरी और इन दिनों नक्सलियों को विदेशी  ताकतों से मदद की खबर आ रही है , जो  देश की आंतरिक समस्या के लिये  काफी गंभीर मसला  है .  

शनिवार, 27 अक्टूबर 2012


                      भारत को चारो ओर से घेरता चीन  

 भारत ने हमेशा से दुनिया मे शांति स्थापना को प्रधानता दी है , जिस कारण भारत को कई बार काफी महँगी कीमत चुकानी पड़ी है .भारत के आधुनिक इतिहास का सबसे काला साल १९६२ रहा ,जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया ओर भारत की बहुत सारी जमीन  हथिया ली जो आज भी चीन के कब्जे मे है इस घटना से भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि एक कमजोर देश के रूप मे उभरी . जवाहर लाल नेहरु ने चीन पर आँख मूंद कर विश्वास किया वही दूसरी ओर माओ ने विश्वासघात किया  .उस समय के तात्कालिक सरकार पर ये आरोप लगते रहे हैं की इस युद्ध को रोका जा सकता था .
उस समय बहुत सारी गलती हुई ,लेकिन ये ग़लत चीज़ें इतनी हुईं कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने अपनी सरकार पर गंभीर आरोप तक लगा दिए. उन्होंने चीन पर आसानी से विश्वास करने और वास्तविकताओं की अनदेखी के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया .
                     




"भारत और चीन को एशिया में दो बड़ी सैन्य शक्ति तो माना ही जाता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन देशों को काफ़ी दमदार माना जाता है. अक्सर इन दोनों देशों की तुलना भी की जाती है."
युद्ध के पचास साल बीत जाने के भी भारत के संबंध चीन से बहुत ज्यादा सामान्य नही हुए हैं ,अभी भी कभी कभी सीमा पर चीन के सैनिक सीमा उलंघन करते रहते हैं . चीन ने कश्मीर से आने वाले भारतीयों को अलग से नत्थी करके वीजा देने की शुरुवात की ,निःसंदेह चीन भारत को अस्थिर करना चाहता है .          
 भारत की भौगोलिक दशा ऐसी है की वो चारो ओर से दुश्मनों से घिरा हुआ है . ऐसी मे सबसे बड़ा सवाल ये उभर कर सामने आता है की भारत का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है  . किस देश  से भारत को सबसे ज्यादा खतरा है . भारत की बड़ी आबादी पकिस्तान  को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती है , परन्तु अगर राजनितिक ओर कुटनीतिक स्तर पे देखे तो चीन भारत के लिया सबसे बड़ा खतरा बन कर उभरा है. संयोग की बात ये है  की इन सब  के बावजूद हमारा सबसे ज्यादा व्यापार भी चीन से ही होता है , वो अलग बात है की चीन की इसमें ८० फीसदी तक हिस्सेदारी है .
              व्यापारिक दृष्टि से अगर देखे तो चीन इसमें मे भी  उदारीकरण के नाम पर भारत को पंगु बनाने की  कोशिश  कर कर रहा है , चीन अपने देश मे निर्मित सारे  सस्ते माल को हमारे देश  मे पाट  रहा  है ,जबकि भारत चीन की तुलना मे अपने माल को बेचने  मे नाकाम रहा है .चीन खासकर भारत मे अपने दोयम दर्जे के इलेक्ट्रोनिक उत्पाद को खपा रहा है , जाहिर सी बात है आम  भारतीय महेंगे उत्पाद के बदले सस्ते चीनी उत्पाद खरीदने को वरीयता देते हैं. आजकल चीन एक सोची समझी चाल के अंतर्गत भारत के देवी देवताओ की मूर्ति तक बेच रहा है ओर तो ओर चीन पारंपरिक बनारस साडी उद्योग पर भी कब्ज़ा कर रहा है , जिस कारण बनारस के हथकरघा मजदुर के सामने अपनी जीविका चलाने का संकट पैदा  हो  गया है . अब भारत के सामने  ये चुनौती है की कैसे चीनी उत्पादों का मुकाबला करें????
                      राजनितिक स्तर से देखे तो चीन इसमें भी भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है ,भारत के पडोसी मुल्को मे चीन लगातार अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है .इसमें भारत की सुस्त विदेश निति भी चीन को काफी मदद कर रही है , हाल के दिनों मे चीन नेपाल मे भारत विरोधी ताक़तों को बढ़ाने की साजिश कर रहा है.  वहीँ दूसरी ओर श्रीलंका मे चीन  बंदरगाह ओर उद्योग स्थापित कर  रहा है .  पकिस्तान की स्थिती किसी से छिपी नही है ,चीन पकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है ,पकिस्तान की अर्थव्यवस्था काफी बुरे दौर से गुजर रही है लेकिन वहां की सैन्य शक्ति मे तेजी से इजाफा हो रहा है , इन सब के पीछे चीन का हाथ है ओर चीन पकिस्तान को आधुनिक हथियारों से लेस कर रहा है .
सैन्य स्तर पर देखे तो चीन ने लगातार अपनी स्थिती मजबूत की है हालांकि भारत ने भी अपनी सैन्य ताक़त इजाफा किया है परतु अभी भी भारत चीन से सीधे सीधे टक्कर लेने की स्थिती मे नही है . हाल के दिनों मे चीन  वैश्विक स्तर पर मजबूत देश के रूप मे उभरा है .
                                                

आइए नज़र डालें इन दोनों देशों के मौजूदा सैन्य समीकरणों पर...
भारत बनाम चीन

1,325,000
सशस्त्र सेना
2,285,000
1,155,000
अनुमानित रिजर्व सेना
5,10,000
1,301,000
अर्धसैनिक बल
6,60,000
568
युद्धक टैंक
2800
20
लड़ाकू हेलिकॉप्टर
16
15
सब मरीन
60
280
चौथी पीढी के सामरिक विमान
747
784
लड़ाकू/ज़मीनी लड़ाई वाले विमान
1669
0
अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल लाँचर
66
2
पूर्व चेतावनी देने वाले और नियंत्रित विमान
14
1105
आधुनिक बख़्तरबंद पैदल सेना गाड़ियाँ
2390
1
विमानवाहक जहाज़
1
10
विध्वंसक पोत
13
11
छोटे लड़ाकू जहाज़
65
भारत-चीन: सैन्य ख़र्च
रक्षा खर्च (अमरीकी मिलियन डॉलर में)
रक्षा खर्च (अमरीकी मिलियन डॉलर में)
रक्षा खर्च (प्रति व्यक्ति आय यूएस डॉलर)
रक्षा खर्च (प्रति व्यक्ति आय यूएस डॉलर)
रक्षा खर्च (जीडीपी के प्रतिशत पर आधारित)
रक्षा खर्च (जीडीपी के प्रतिशत पर आधारित)
भारत
चीन
भारत
चीन
भारत
चीन
2008
31450
60187
28
46
2.52
1.33
2009
38278
70381
33
53
3.11
1.41
2010
30865
76361
26
57
1.89
1.30








अभी वैश्विक स्तर अगर चीन को कोई चुनौती दे रहा है तो वो भारत है ,इसलिये  चीन भारत को हर मोर्चे पर विफल करना चाहता है , अभी हाल मे भारत की अमेरिका से बढ़ती  दोस्ती ने चीन को बैचैन कर दिया है इसलिये  वह पाकिस्तान ओर भारत के पडोसी मुल्को से लगातार अपनी दोस्ती बढ़ा  रहा है .जब पिछली बार अमेरिका के राष्ट्रपति भारत आये थे तो ओबामा ने भारत के संसद मे भाषण  दिया था वही दूसरी ओर चीन ने भी पाकिस्तान के नेशनल असेम्बली मे भाषण दिया .
                              ये तो तय है की चीन भारत पर सीधे तौर पर आक्रमण नही कर सकता ,क्योंकि कोई भी परमाणु संपन्न देश किसी दुसरे परमाणु संपन्न देश से युद्ध करने का खतरा मोल लेना नही लेना चाहेगा . पर चीन हर मोर्चे पर भारत को चुनौती दे रहा है . दोनों देश विश्व की महाशक्ति बनने की ओर अपने कदम बढ़ा रहे हैं . महामंदी आने के बाद चीन ओर भारत ही ऐसी देश हैं जिन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को सुस्त नही होने दिया .लेकिन दोनों देश साथ मे विकास करने के बजाय एक दुसरे को नीचा दिखने मे लगे रहते हैं , खासकर चीन भारत को एक विकासशील से विकसित देश बनते हुआ नही देखना चाहता . चीन लगातार पकिस्तान को इसलिए भी सैन्य तौर पर मजबूत कर रहा है की वह भारत को चुनौती पेश कर सके . पाकिस्तान मे चीन ग्वादर बंदरगाह बना रहा है ताकि वह भारत को सैन्य स्तर पर घेर सके . चीन पाकिस्तान को परमाणु बम बनाने मे स्पष्ट तौर पर मदद कर रहा है ओर भारत के खिलाफ चल रहे आतंकवादी गतिविधि का कभी भी विरोध नही करता .
                                    अभी हाल मे ही चीन ने साऊथ चाइना सी मे अपनी दावेदारी पेश की , चीन ने भारत ओर विएतनाम के चल रहे संयुक्त प्रोजेक्ट का जोरदार विरोध किया है . चीन लगातार अपनी सीमओं को बढ़ाने पर लगा हुआ है ,तिब्बत मे तो वह चीनी नागरिक को बसा रहा है ,वहां लगातार बढ़ रहे आत्मदाह के मामले के बाद भी चीन किसी की नही सुन रहा है
                                          भारत को जरूरत है चीन की हर चाल समझने की ,ताकि १९६२ के हालात फिर से ना दोहराया जा सके , चीन ने तभी भारत को सैन्य स्तर पर चुनौती दी थी परन्तु इस बार चीन भारत को आर्थिक स्तर पर चुनौती दे रहा है. लोकतंत्र के बहुत सारे फायदे हैं परन्तु लोकतंत्र मे गठबंधन की राजनीति सही ओर कठोर निर्णय को लेने मे बाधक होती है . भारत मे जरूरत है कम से कम विदेश नीति मे सभी दल ओर गठबंधन एक साथ सर्वसम्मति से निर्णय  ले ताकि देश की संप्रभुता पे कोई आंच न आये .....