शनिवार, 27 अक्टूबर 2012


                      भारत को चारो ओर से घेरता चीन  

 भारत ने हमेशा से दुनिया मे शांति स्थापना को प्रधानता दी है , जिस कारण भारत को कई बार काफी महँगी कीमत चुकानी पड़ी है .भारत के आधुनिक इतिहास का सबसे काला साल १९६२ रहा ,जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया ओर भारत की बहुत सारी जमीन  हथिया ली जो आज भी चीन के कब्जे मे है इस घटना से भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि एक कमजोर देश के रूप मे उभरी . जवाहर लाल नेहरु ने चीन पर आँख मूंद कर विश्वास किया वही दूसरी ओर माओ ने विश्वासघात किया  .उस समय के तात्कालिक सरकार पर ये आरोप लगते रहे हैं की इस युद्ध को रोका जा सकता था .
उस समय बहुत सारी गलती हुई ,लेकिन ये ग़लत चीज़ें इतनी हुईं कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने अपनी सरकार पर गंभीर आरोप तक लगा दिए. उन्होंने चीन पर आसानी से विश्वास करने और वास्तविकताओं की अनदेखी के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया .
                     




"भारत और चीन को एशिया में दो बड़ी सैन्य शक्ति तो माना ही जाता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन देशों को काफ़ी दमदार माना जाता है. अक्सर इन दोनों देशों की तुलना भी की जाती है."
युद्ध के पचास साल बीत जाने के भी भारत के संबंध चीन से बहुत ज्यादा सामान्य नही हुए हैं ,अभी भी कभी कभी सीमा पर चीन के सैनिक सीमा उलंघन करते रहते हैं . चीन ने कश्मीर से आने वाले भारतीयों को अलग से नत्थी करके वीजा देने की शुरुवात की ,निःसंदेह चीन भारत को अस्थिर करना चाहता है .          
 भारत की भौगोलिक दशा ऐसी है की वो चारो ओर से दुश्मनों से घिरा हुआ है . ऐसी मे सबसे बड़ा सवाल ये उभर कर सामने आता है की भारत का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है  . किस देश  से भारत को सबसे ज्यादा खतरा है . भारत की बड़ी आबादी पकिस्तान  को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती है , परन्तु अगर राजनितिक ओर कुटनीतिक स्तर पे देखे तो चीन भारत के लिया सबसे बड़ा खतरा बन कर उभरा है. संयोग की बात ये है  की इन सब  के बावजूद हमारा सबसे ज्यादा व्यापार भी चीन से ही होता है , वो अलग बात है की चीन की इसमें ८० फीसदी तक हिस्सेदारी है .
              व्यापारिक दृष्टि से अगर देखे तो चीन इसमें मे भी  उदारीकरण के नाम पर भारत को पंगु बनाने की  कोशिश  कर कर रहा है , चीन अपने देश मे निर्मित सारे  सस्ते माल को हमारे देश  मे पाट  रहा  है ,जबकि भारत चीन की तुलना मे अपने माल को बेचने  मे नाकाम रहा है .चीन खासकर भारत मे अपने दोयम दर्जे के इलेक्ट्रोनिक उत्पाद को खपा रहा है , जाहिर सी बात है आम  भारतीय महेंगे उत्पाद के बदले सस्ते चीनी उत्पाद खरीदने को वरीयता देते हैं. आजकल चीन एक सोची समझी चाल के अंतर्गत भारत के देवी देवताओ की मूर्ति तक बेच रहा है ओर तो ओर चीन पारंपरिक बनारस साडी उद्योग पर भी कब्ज़ा कर रहा है , जिस कारण बनारस के हथकरघा मजदुर के सामने अपनी जीविका चलाने का संकट पैदा  हो  गया है . अब भारत के सामने  ये चुनौती है की कैसे चीनी उत्पादों का मुकाबला करें????
                      राजनितिक स्तर से देखे तो चीन इसमें भी भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है ,भारत के पडोसी मुल्को मे चीन लगातार अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है .इसमें भारत की सुस्त विदेश निति भी चीन को काफी मदद कर रही है , हाल के दिनों मे चीन नेपाल मे भारत विरोधी ताक़तों को बढ़ाने की साजिश कर रहा है.  वहीँ दूसरी ओर श्रीलंका मे चीन  बंदरगाह ओर उद्योग स्थापित कर  रहा है .  पकिस्तान की स्थिती किसी से छिपी नही है ,चीन पकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है ,पकिस्तान की अर्थव्यवस्था काफी बुरे दौर से गुजर रही है लेकिन वहां की सैन्य शक्ति मे तेजी से इजाफा हो रहा है , इन सब के पीछे चीन का हाथ है ओर चीन पकिस्तान को आधुनिक हथियारों से लेस कर रहा है .
सैन्य स्तर पर देखे तो चीन ने लगातार अपनी स्थिती मजबूत की है हालांकि भारत ने भी अपनी सैन्य ताक़त इजाफा किया है परतु अभी भी भारत चीन से सीधे सीधे टक्कर लेने की स्थिती मे नही है . हाल के दिनों मे चीन  वैश्विक स्तर पर मजबूत देश के रूप मे उभरा है .
                                                

आइए नज़र डालें इन दोनों देशों के मौजूदा सैन्य समीकरणों पर...
भारत बनाम चीन

1,325,000
सशस्त्र सेना
2,285,000
1,155,000
अनुमानित रिजर्व सेना
5,10,000
1,301,000
अर्धसैनिक बल
6,60,000
568
युद्धक टैंक
2800
20
लड़ाकू हेलिकॉप्टर
16
15
सब मरीन
60
280
चौथी पीढी के सामरिक विमान
747
784
लड़ाकू/ज़मीनी लड़ाई वाले विमान
1669
0
अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल लाँचर
66
2
पूर्व चेतावनी देने वाले और नियंत्रित विमान
14
1105
आधुनिक बख़्तरबंद पैदल सेना गाड़ियाँ
2390
1
विमानवाहक जहाज़
1
10
विध्वंसक पोत
13
11
छोटे लड़ाकू जहाज़
65
भारत-चीन: सैन्य ख़र्च
रक्षा खर्च (अमरीकी मिलियन डॉलर में)
रक्षा खर्च (अमरीकी मिलियन डॉलर में)
रक्षा खर्च (प्रति व्यक्ति आय यूएस डॉलर)
रक्षा खर्च (प्रति व्यक्ति आय यूएस डॉलर)
रक्षा खर्च (जीडीपी के प्रतिशत पर आधारित)
रक्षा खर्च (जीडीपी के प्रतिशत पर आधारित)
भारत
चीन
भारत
चीन
भारत
चीन
2008
31450
60187
28
46
2.52
1.33
2009
38278
70381
33
53
3.11
1.41
2010
30865
76361
26
57
1.89
1.30








अभी वैश्विक स्तर अगर चीन को कोई चुनौती दे रहा है तो वो भारत है ,इसलिये  चीन भारत को हर मोर्चे पर विफल करना चाहता है , अभी हाल मे भारत की अमेरिका से बढ़ती  दोस्ती ने चीन को बैचैन कर दिया है इसलिये  वह पाकिस्तान ओर भारत के पडोसी मुल्को से लगातार अपनी दोस्ती बढ़ा  रहा है .जब पिछली बार अमेरिका के राष्ट्रपति भारत आये थे तो ओबामा ने भारत के संसद मे भाषण  दिया था वही दूसरी ओर चीन ने भी पाकिस्तान के नेशनल असेम्बली मे भाषण दिया .
                              ये तो तय है की चीन भारत पर सीधे तौर पर आक्रमण नही कर सकता ,क्योंकि कोई भी परमाणु संपन्न देश किसी दुसरे परमाणु संपन्न देश से युद्ध करने का खतरा मोल लेना नही लेना चाहेगा . पर चीन हर मोर्चे पर भारत को चुनौती दे रहा है . दोनों देश विश्व की महाशक्ति बनने की ओर अपने कदम बढ़ा रहे हैं . महामंदी आने के बाद चीन ओर भारत ही ऐसी देश हैं जिन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को सुस्त नही होने दिया .लेकिन दोनों देश साथ मे विकास करने के बजाय एक दुसरे को नीचा दिखने मे लगे रहते हैं , खासकर चीन भारत को एक विकासशील से विकसित देश बनते हुआ नही देखना चाहता . चीन लगातार पकिस्तान को इसलिए भी सैन्य तौर पर मजबूत कर रहा है की वह भारत को चुनौती पेश कर सके . पाकिस्तान मे चीन ग्वादर बंदरगाह बना रहा है ताकि वह भारत को सैन्य स्तर पर घेर सके . चीन पाकिस्तान को परमाणु बम बनाने मे स्पष्ट तौर पर मदद कर रहा है ओर भारत के खिलाफ चल रहे आतंकवादी गतिविधि का कभी भी विरोध नही करता .
                                    अभी हाल मे ही चीन ने साऊथ चाइना सी मे अपनी दावेदारी पेश की , चीन ने भारत ओर विएतनाम के चल रहे संयुक्त प्रोजेक्ट का जोरदार विरोध किया है . चीन लगातार अपनी सीमओं को बढ़ाने पर लगा हुआ है ,तिब्बत मे तो वह चीनी नागरिक को बसा रहा है ,वहां लगातार बढ़ रहे आत्मदाह के मामले के बाद भी चीन किसी की नही सुन रहा है
                                          भारत को जरूरत है चीन की हर चाल समझने की ,ताकि १९६२ के हालात फिर से ना दोहराया जा सके , चीन ने तभी भारत को सैन्य स्तर पर चुनौती दी थी परन्तु इस बार चीन भारत को आर्थिक स्तर पर चुनौती दे रहा है. लोकतंत्र के बहुत सारे फायदे हैं परन्तु लोकतंत्र मे गठबंधन की राजनीति सही ओर कठोर निर्णय को लेने मे बाधक होती है . भारत मे जरूरत है कम से कम विदेश नीति मे सभी दल ओर गठबंधन एक साथ सर्वसम्मति से निर्णय  ले ताकि देश की संप्रभुता पे कोई आंच न आये .....

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

बदलते बिहार मे बदलते नितीश


 बदलते बिहार मे बदलते नितीश
 क्या बिहार मे सचमुच विकास  हुआ है ??? क्या बिहार सचमुच विकसित राज्य बनने की और अग्रसर है??? ये ऐसे प्रश्न हैं जो नितीश कुमार के सत्ता मे आने के बाद लगातार बिहार और बिहार से बाहर चर्चा का विषय है 


                                                  
 अभी बिहार मे हो रहे हाल की घटनाओ पर नजर डाले तो ये साफ़ दीखता है की नितीश कुमार की शाख गिरी है. अब ये भी सवाल उठता है की क्या ये विपक्ष की कोई चाल है या सच मे नितीश कुमार अब बिहार मे लोकप्रिय नही रहें . यहाँ ये चर्चा करने की जरूरत है की नितीश कुमार किन हालातो मे पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने , बिहार की जनता लालू और उसके परिवार के सदस्यों की मनमानी से तंग आ गयी थी , चारो तरफ आराजकता का माहौल बन गया था . १५ सालो मे लालू यादव ने बिहार को कोमा की स्थिती ला कर खड़ा कर दिया  .                                                      
                       

यादवो और पिछरी जातियों के लोगो का ये तर्क था की लालू यादव ने हमे बोलने के लिया आवाज दिया है ,हमे ताक़त दी है की हम सवर्णों और ताक़तवर लोगो का विरूद्ध आवाज  उठा सके. परन्तु क्या इसी बिनाह पर कोई १५ साल तक शासन  कर सकता है???  ९० के दशक मे अपहरण एक उद्योग के रूप मे स्थापित हो चूका था और बहुत सारे बाहुबली अपनी मनमानी कर रहे थे ..
                              

ऐसे मे जब नितीश कुमार  एक विकल्प के रूप मे उभरे तो बिहार की जनता ने उन्हें खुल कर वोट दिया . खासकर लालू यादव के मुख्य वोट बैंक  यादव और मुस्लिम ने भी नितीश कुमार को वोट दिया .सत्ता मे आने के बाद नितीश कुमार ने बहुत तेजी से काम भी किया , खासकर उन्होंने बिहार के कानून व्यवस्था को अपने शाषण  के शुरुवाती दिनों मे ही बहुत हद तक सुधार दिया .५ महीने के अन्दर लगभग सभी बाहुबली जेल के अन्दर थे परन्तु मोकामा विधायक अनंत सिंह पर कोई करवाई न होना उनकी सत्यनिष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लगाता है ....
                    

बिहार मे जिस तेजी रोड बनायीं गयी उतनी तेजी से पहले कभी नही बनाई गयी थी ,नितीश कुमार का ये  वादा  की सड़के इस तरह की बनेगी की  चाहे आप बिहार की किसी भी कौने मे हो  पटना ७ घंटे के अन्दर पहुच जायेगे ,७ घंटे के अन्दर तो नही लेकिन सड़के पहले से काफी  अच्छी  हुई हैं,इसमें कोई शक नही है .. साइकिलो से स्कूल जाती लडकियां बिहार की पहचान बन गयी.......
                            

तो ऐसे मे ये प्रश्न  उठना लाज़िमी है की आखिर नितीश कुमार से गलती हुई कहाँ???? क्या उनका मीडिया मैनेजमेंट गलत हो गया या उनकी सोशल इंजीनियरिंग को लकवा मार गया.


                                             कारणों को खोज करने की कोशिश पर पता चलता है की नितीश कुमार ने खुद अपने ही  पैर पर कुल्हारी मारी है .पहले चरण मे ऐसे शिक्षको की नियुक्ति करना जो सिर्फ इंटर पास हैं और जिनके पास कुल प्रतिशत आधिक है ,नितीश कुमार की बहुत बड़ी भूल थी ,  जिस लालू के शाषण की बुराई  करते नितीश कुमार  नही थकते थे  वे ये कैसे भूल गए की उस समय बिहार मे प्रतिशत कैसे लाये जाते थे , अगर उस तरह के शिक्षक बच्चों को पढ़ाएंगे तो शिक्षा का स्तर तो गर्त मे जाएगा ही . हाल के अधिकार यात्रा के दौरान इन्ही शिक्षको ने नितीश कुमार का बिहार के विभिन्न जिलो मे विरोध किया .जिसका पूरा फायदा लालू और रामबिलास पासवान ने उठाया ,ऐसे ही मुद्दों के ताक  मे ये दोनों न जाने कितने दिनों से मुह बाये खड़े थे .              
                             

यहाँ बड़ा सवाल ये है की नियोजित शिक्षक न ही परीक्षा मे बैठना चाहते हैं न ही उनके पास उच्चतर डिग्री है तो वे किस आधार पर स्थायी शिक्षको के जैसी सुविधायो और वेतन की मांग कर रहे हैं ??? इस परिस्थिति मे नितीश कुमार का नियोजित शिक्षको के प्रति कड़ा रुख ने आग मे घी डालने का काम किया है  ...
                          

जिस मिडिया को उन्होंने इतने दिनों तक मैनेज कर के रखा था आज वही मिडिया उनके खिलाफ आग क्यों उगल रहा है ,क्या बिहार मे  मिडिया को सत्ता परिवर्तन होने की बू मिल गयी है या सच मे मिडिया निष्पक्ष होना चाहती है ????
                           

दूसरा कारण वह नरेन्द्र मोदी का गुजरात दंगो को लेकर विरोध करते हैं , लेकिन जब वे रेल मंत्री थे और गुजरात दंगे भड़के थे तो उस समय नेतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा क्यों नही दिया .. और जब वे मुख्यमंत्री बन गए तो सेकुलर होने का ढोंग करने लगे , इस से भाजपा मे भी उनके खिलाफ विरोध के स्वर उभरने लगे हैं .
                        नितीश कुमार चारो तरफ से चाटुकारों से घिर गए हैं ,उन्हें ये पता ही नही चल पाता  की जनता मे उसके खिलाफ कहाँ और क्यों विरोध है ??? दूसरी तरफ विधानसभा मे विपक्ष की न्यूनतम संख्या ने भी नितीश कुमार को आत्मविमुघता  की स्थिती मे ला खड़ा किया है .
                     

ऐसे मे  चारो तरफ समस्याओ से घिरे नितीश कुमार की अब वास्तविक परीक्षा शुरू होती है , लालू यादव के खराब शाषण का सीधा लाभ नितीश कुमार को मिला , बिहार की जनता ने बिजली देखी,अच्छी सड़के देखी ,बेटियाँ घेरो से निकलकर बाहर पड़ने को निकली . नितीश कुमार ने विकास  का पैमाना तय किया ,किन्तु अब नितीश कुमार के सामने लगातार विकास करने की चुनौती है,लोगो की आकांक्षाओं पर खड़े होने की चुनौती  है .  नितीश कुमार को ये हमेशा  याद रखना चाहिए की बिहार की जनता बड़े बड़े सत्ता परिवर्तन करने का आदि रही है ...........                                                                                                                       

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

जलता तिब्बत जलते लोग


नयी दिल्ली , १५ अक्टुबर. जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में १३ अक्टुबर को तिब्बतियों के समर्थन में शांतिपूर्ण  केंडल मार्च निकला गया . इसमें ज्यादातर तिब्बत ,साउथ कोरिया और  नेपाली मूल के लोग शामिल  थे . तिब्बती नागरिक लगातर चाइना के खिलाफ अपने विरोध किसी न किसी रूप में  रहते दर्शाते  हैं . उसी की एक कड़ी जे.न .वि  में देखने को मिली .
                  
                        Description: C:\Users\HCL\Desktop\2012-10-13 19.55.15.jpg
                     “आत्मदाह किये हुए तिब्बती युवको  की तस्वीर”
  एक तिब्बती नागरिक “किनले शेरिंग” ने बातचीत के दौरान   बताया की तिब्बत को आजाद करवाने की कोशिश में बहुत सारे युवाओं ने आत्मदाह किया और लगातार कर रहे हैं . उन्होंने कहा इसके बाद भी चाइना सरकार की  कान में जूं तक नही रेंगा .किनले ने एक पत्र दिखाते हुआ कहा की वे लोग इस पत्र को तिब्बतियों की तरफ से संयुक्त रास्त्र संघ के सचिव ‘बान की मून ’ को भेजने वाले हैं . उन्होंने बताया की इस पत्र के माध्यम से वे लोग बताना दुनिया को बताना चाहते हैं की किस तरह चाइना ने बीते छह दशक  से तिब्बत का हर प्रकार से दोहन किया है .चाइना सरकार ने न सिर्फ तिब्बत के प्राकृतिक संसाधन का दोहन किया है बल्कि वहां के लोगो के साथ काफी अत्याचार किया है.
    पत्र के अनुसार  वर्ष २००८ में चाइना रक्षा बल के जवानों ने तिब्बतियों के साथ काफी सख्ती से करवाई की . शेरिंग बताते हैं उसके बाद से स्थिति लगातार बदतर होती गयी , लोगो ने विरोध स्वरूप आत्मदाह करने का तरीका अपनाया है. इस हिंसात्मक तरीके के बारे में पूछने पर किनले बताते हैं की पूरी दुनिया तक अपनी बात बताने का इस के सिवाय हमारे पास और कोई दूसरा रास्ता नही था .
किनले ने पत्र की ओर इशारा करते हुआ बताया की हम संयुक्त रास्त्र से ये अपील करते हैं की एक निष्पक्ष जाँच एजेंसी को जल्दी तिब्बत भेजा जाये ताकि वहां की सच्चाई पूरी दुनिया के सामने आ सके . किनले ने बताया की हम ‘ फ्लेम ऑफ़ ट्रुथ’  कार्यकर्म चला रहे हैं जिसके अंतर्गत हम दुनिया भर  से हस्ताक्षर  एकत्रित कर रहे हैं और दुनिया भर से अपने लिए समर्थन जूता रहे हैं.
पास में ही एक लड़की बार बार बात करने की कोशीश  कर रही थी , पूछने पर उसने बताया की वह साउथ कोरिया से है और तिब्बतियों का समर्थन कर रही है . हालाँकि वह ठीक से इंग्लिश नही बोल पा  रही थी लेकिन फिर भी  मसले पर चाइना के खिलाफ उसका विरोध स्पष्ट समझ में आ रहा था .
       इधर जे’.नि .वि. में आत्मदाह किये हुआ युवको को शर्धांजलि दी जा रही थी वही दुसरे दिन “‘तेम्द्रिन दोरजी” नामक तिब्बतियों की अधिकार की लडाई लड़ने वाले युवक ने चाइना में ही आत्मदाह कर लिया . हैरानी की बात यह है की इस के बाद भी चाइना सरकार दलाई लामा पे दोष मड़ते जा रही है.


जलता तिब्बत जलते लोग


नयी दिल्ली , १५ अक्टुबर. जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में १३ अक्टुबर को तिब्बतियों के समर्थन में शांतिपूर्ण  केंडल मार्च निकला गया . इसमें ज्यादातर तिब्बत ,साउथ कोरिया और  नेपाली मूल के लोग शामिल  थे . तिब्बती नागरिक लगातर चाइना के खिलाफ अपने विरोध किसी न किसी रूप में  रहते दर्शाते  हैं . उसी की एक कड़ी जे.न .वि  में देखने को मिली .
                  
                        Description: C:\Users\HCL\Desktop\2012-10-13 19.55.15.jpg
                     “आत्मदाह किये हुए तिब्बती युवको  की तस्वीर”
  एक तिब्बती नागरिक “किनले शेरिंग” ने बातचीत के दौरान   बताया की तिब्बत को आजाद करवाने की कोशिश में बहुत सारे युवाओं ने आत्मदाह किया और लगातार कर रहे हैं . उन्होंने कहा इसके बाद भी चाइना सरकार की  कान में जूं तक नही रेंगा .किनले ने एक पत्र दिखाते हुआ कहा की वे लोग इस पत्र को तिब्बतियों की तरफ से संयुक्त रास्त्र संघ के सचिव ‘बान की मून ’ को भेजने वाले हैं . उन्होंने बताया की इस पत्र के माध्यम से वे लोग बताना दुनिया को बताना चाहते हैं की किस तरह चाइना ने बीते छह दशक  से तिब्बत का हर प्रकार से दोहन किया है .चाइना सरकार ने न सिर्फ तिब्बत के प्राकृतिक संसाधन का दोहन किया है बल्कि वहां के लोगो के साथ काफी अत्याचार किया है.
    पत्र के अनुसार  वर्ष २००८ में चाइना रक्षा बल के जवानों ने तिब्बतियों के साथ काफी सख्ती से करवाई की . शेरिंग बताते हैं उसके बाद से स्थिति लगातार बदतर होती गयी , लोगो ने विरोध स्वरूप आत्मदाह करने का तरीका अपनाया है. इस हिंसात्मक तरीके के बारे में पूछने पर किनले बताते हैं की पूरी दुनिया तक अपनी बात बताने का इस के सिवाय हमारे पास और कोई दूसरा रास्ता नही था .
किनले ने पत्र की ओर इशारा करते हुआ बताया की हम संयुक्त रास्त्र से ये अपील करते हैं की एक निष्पक्ष जाँच एजेंसी को जल्दी तिब्बत भेजा जाये ताकि वहां की सच्चाई पूरी दुनिया के सामने आ सके . किनले ने बताया की हम ‘ फ्लेम ऑफ़ ट्रुथ’  कार्यकर्म चला रहे हैं जिसके अंतर्गत हम दुनिया भर  से हस्ताक्षर  एकत्रित कर रहे हैं और दुनिया भर से अपने लिए समर्थन जूता रहे हैं.
पास में ही एक लड़की बार बार बात करने की कोशीश  कर रही थी , पूछने पर उसने बताया की वह साउथ कोरिया से है और तिब्बतियों का समर्थन कर रही है . हालाँकि वह ठीक से इंग्लिश नही बोल पा  रही थी लेकिन फिर भी  मसले पर चाइना के खिलाफ उसका विरोध स्पष्ट समझ में आ रहा था .
       इधर जे’.नि .वि. में आत्मदाह किये हुआ युवको को शर्धांजलि दी जा रही थी वही दुसरे दिन “‘तेम्द्रिन दोरजी” नामक तिब्बतियों की अधिकार की लडाई लड़ने वाले युवक ने चाइना में ही आत्मदाह कर लिया . हैरानी की बात यह है की इस के बाद भी चाइना सरकार दलाई लामा पे दोष मड़ते जा रही है.


सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

A long walk to coffee house

नयी दिल्ली ,८ अक्टूबर ,    ९ प्रधानमंत्री ,२ राष्ट्रपति ,२ उप राष्ट्रपति और ३४ मुख्यमंत्री का गवाह रह चुकी कॉफ़ी हाउस की संस्कृति काफी अनूठी है

                                                           दिल्ली के दिल कनाट प्लेस के मोहन सिंह प्लेस मे अवस्थित कॉफ़ी हाउस २७ अक्टूबर १९५७ से लोगो की चर्चाओ का केंद्र बना हुआ है . यह इंडियन कॉफ़ी वोर्केर्स कॉपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड द्वारा संचालित होता है

                                                            देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ,लालबहादुर शास्त्री ,इन्द्रा गाँधी ,राजीव गाँधी ,आई के गुजराल , वी पी सिंह ,चन्द्र शेखर ,नरसिम्हा राव ,अटल बिहारी वाजपेयी अपने राजनितिक जीवन के शुरुआत से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक यहाँ आते रहे .

                                                                     

                                                       "कॉफ़ी हाउस के मेनेजर श्री  जनक राज "

                                                           
                                                             १९७२ से कॉफ़ी हाउस के मेनेजर जनक राज अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताते है की खालसा कॉलेज की स्थापना पर उन्होंने इंदिरा गाँधी को कॉफ़ी पिलाई थी . जनक राज बताते है की यहाँ समाज का संभ्रांत वर्ग भी आता है तो वही दूसरी ओर मध्यवर्गीय परिवार भी यहाँ आनंद उठाता दिख जाता है , उन्होंने बताया की १९९५ के आस पास वित्तीय संकट के कारण यह बंद होने के कगार पर पहुच गया था परन्तु सामाजिक कार्यकर्ताओ के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पाया. कॉफ़ी हाउस की दयनीय अवस्था के लिए बहुत हद तक सरकार को जिम्मेदार मानते है . वे कॉफ़ी हाउस की लिस्ट की तरफ इशारा करते हुए कहते  है की इतने कम दामों मे इसे चला पाने मे  काफी मुश्किले आती है, जिस कारण यहाँ के २२ कर्मचारी को काफी कम वेतन मिल पता है .


                                                          " कॉफ़ी हाउस की मूल्य सूचिका"
                                                                                                                                                                                 
                                                              १९६८ से लगातार कॉफ़ी हॉउस आ रहे व्यापारी दिनेश कुमार शर्मा बताते हैं की अब कॉफ़ी हॉउस मे सम्मानित व्यक्ति आने से कतराते हैं , क्योंकि यहाँ का स्तर लगातार गिर रहा है . शर्मा जी बताते हैं की यहाँ अब साफ़ सफाई का आभाव है ओर सरकार द्वारा पर्याप्त सुविधाएँ देने के बाद भी ये लोग लगातार मूल्य बढ़ाते जा रहे हैं.

                                                       वही कॉफ़ी हाउस के बहार अपने दोस्तों के साथ बेठे उमेश मेहता ने बताया की वे यहाँ १९७० से आ रहे है .उन्होंने बताया की अब यहाँ राजनीति ओर साहित्य की बाते कम होती है ओर फिल्मो की जयादा होती है. मेहता साहब बताते है की कॉफ़ी हाउस उनकी संस्कृति का हिस्सा हो गया है .

                                                         कॉफ़ी हाउस के बाहर बैठे   कुछ युवा पूछने पे बताते है की वे यहाँ शांति के मकसद से आते है तथा यहाँ  कम दाम मे साउथ इंडियन डिश का लुफ्त उठाते है .

                                                          कॉफ़ी हाउस के इतिहास मे सुनहरा  दिन तब आया जब २००७ मे  टाइम्स  मैगज़ीन ने इसे एशिया की टॉप फ़ूड पॉइंट मै जगह दी .